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Sunday, October 4, 2009

शरद पूर्णिमा का चाँद !




कल रात चाँद पूरी तरह दहक रहा था. और दहकता भी क्यों नहीं, आखिर शरद पूर्णिमा का चाँद था. वो भी भला हो बिजली विभाग का जिस ने एक डेढ़ घंटा बिजली गुल कर पूर्णिमा की चांदनी का आनंद दिलवा दिया. बीच बीच में छोटे मोटे बादल भी चंद्रमा के साथ आँख मचोली खेलते रहे पर 'शशि जी' अपनी आभा से हमें सराबोर करते ही रहे. इतना ही नहीं मुझे अपनी छवि सहेजने की भी अनुमति प्रदान की.



आधी रात को कौमुदी में नहाई खीर खाई तो देखा चाँद ने अपना रंग उस खीर में उतार दिया था.




Sunday, March 29, 2009

श्री व्रत कथा:

यूँ तो सारे साल ही माता मनसा देवी मन्दिर में भक्तगणों का आना लगा रहता है परन्तु नवरात्रों के दस दिनों में दर्शनार्थियों की संख्या लाखों में पहुँच जाती है। भांत भांत के लोग एक - एक किलोमीटर लम्बी पंक्तियों में घंटों अपनी बारी की प्रतीक्षा करते। समाज के हर वर्ग के लोगों में माता मनसा देवी मन्दिर की बहुत मान्यता है। घर के पास ही यह मन्दिर होने के कारण सड़क पर आते जाते मैं इस दुनिया को देखता हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं नास्तिक हूँ या आज कल के फैशन के अनुसार, मैं agnostic (भगवन के विषय में भ्रमित पढ़े लिखे लोग) हूँ । 'उस' पर मेरी पूर्ण आस्था है। परन्तु मैं ज्यादा कर्म-कांड नहीं कर सकता। मन्दिर या किसी तीर्थ पर जाना मेरे लिए बहुत कष्टदायक है और इस का मुख्य कारण है हमारी मंदिरों व् तीर्थस्थलों का रख-रखाव। खैर यहाँ विषय दूसरा है, मैं बात कर रहा था मनसा देवी मन्दिर की (और यह मन्दिर बहुत व्यवस्थित और साफ़-सुथरा है) और वहां आने वाले भक्तों की। आने वाले सामान्य भक्तों में एक अच्छी संख्या व्रतधारियों की रहती है और यह व्रत होता है अपने घर से मन्दिर तक दंडवत प्रणाम करते आने का। अपनी किसी मनोकामना की प्राप्ति हेतु श्रद्धालु यह प्रण लेते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर (कई बार अग्रिम कर के तौर पर भी) अपने घर से गर्भगृह तक कई किलोमीटर लगातार दंडवत प्रणाम करते आते। स्वाभाविक रूप से इन लोगों को पंक्ति में खड़ा नही होना पड़ता है। इस दंडवत प्रणाम की प्रक्रिया शुरू होती है अपने घर की चौखट से जहाँ पर श्रद्धालु पूजा अर्चना कर मन्दिर की और मुख कर साक्षात् प्रणाम करता तथा लेटे लेटे ही अपने हाथ में पकड़े चाक से एक लकीर लगाता, अब खड़े हो वो दो-एक कदम चल उस लकीर पर आता और फ़िर से दंडवत प्रणाम कर वैसी ही लकीर फिर बनाता। इस प्रकार हजारों उठक बैठक की शरीर तोड़ देने वाली मशक्कत से यह लोग मन्दिर पहुँचते। इस पूरी रस्म के दौरान इन भक्तों के कोई न कोई रिश्तेदार इनके साथ चलते हैं। बहुत बार तो कई तरुण केवल अपनी शारीरिक क्षमता परखने के लिए यह व्रत ले लेते हैं।


अब यह लोग श्रद्धा से यह व्रत लें या किसी मनोकामना पूर्ति की इच्छा के स्वार्थ हेतु या फिर पूर्ण हुयी किसी इच्छा के प्रतिदेय हेतु, मेरा हृदय इन लोगों के विश्वास प्रति सम्मान से भर जाता है। कारण चाहे जो भी रहे, यह कोई सरल राह नहीं है। एक और यह लोग हैं और दूसरी और मेरे जैसे। पिछले कई वर्षों से मैं नवरात्रों के सारे व्रत रखता आया हूँ। परन्तु इन उपवासों में अध्यात्म भाव कम और स्वास्थ्य सम्बन्धी कारण अधिक हैं। सारे साल मैं कोई उपवास नहीं करता इस लिए यह सोच कर कि इन व्रतों से शरीर के पाचन प्रणाली को थोड़ा आराम मिल जाएगा मैं यह व्रत नियमित रखता रहा। परन्तु यह बहुत मजेदार सत्य है कि उतनी वसा, प्रोटीन मैं सामान्य दिनों में नहीं लेता हूँगा जितनी इन सात दिनों में। मेरा वजन इन नवरात्रों में निश्चित ही बढ़ जाता होगा। माँ और पत्नी चिंता करती है की सारा दिन बिना खाने के सर दुखेगा इसलिये सुबह नाश्ते में पत्नी बिना प्याज के आलू की सूखी सब्जी की बाटी (बाटी कटोरी की बड़ी बहन को कहतें हैं) दही के साथ परोसती है। इस हल्के से नाश्ते के पूर्व दो बार की चाय के साथ व्रत वाले चिप्स या लड्डू का जिक्र करना शायद ठीक रहेगा। मेरे न न करने के बाद भी दोपहर को मेरे ऑफिस से किसी लड़के को बुला मेरे लिए कट्टु के आटे की मेथी वाली एक या दो रोटियां ढेर सारे मक्खन (मक्खन इसलिये क्योंकि माँ कहती है कट्टु का आटा बहुत खुश्क होता है) सहित भेज दिया जाता है। अरे हाँ, व्रत में चूँकि फलों का बहुत महत्त्व है इसलिये इन रोटियों के साथ एक आध सेब या केला जरूर रहता है। अब शाम को ऑफिस से लौटने पर (बेटा व्रत के कारण सारे दिन का भूखा होगा ) फलों की चाट या कट्टू के पकोडे चाय के साथ मेरी सारे दिन की क्षुधा शांत करने का प्रयास करते हैं। अब आख़िर इन व्रतों में भोजन तो केवल रात्रि का ही मान्य है इस लिए रात के भोजन में कभी आलू की तरी वाली सब्जी तो कभी पालक का साग किसी न किसी अन्य सूखी सब्जी के साथ (निश्चित ही बिना प्याज के), कट्टु के आटे के रोटियों, अदरक की चटनी (जितनी मात्रा अदरक की उतनी ही मात्रा में देसी घी ), दही, और सब्जी के मात्रा से मैच करती मक्खन की बाटी (मक्खन इसलिये क्योंकि........जी हाँ आप जानते हैं) के साथ खाने को रहता है। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पंजाब में व्रत रखना कितना कठिन है।



पंजाब की अपनी परम्पराएँ हैं। लोग व्रत रखतें हैं न खाने का परन्तु लगता है यहाँ व्रत लिया जाता है खाने का। और पंजाब में खाने का अपना महत्त्व है। खाने के बिना तो सारा जग सूना है। पंजाब और पंजाब के खाने की चर्चा अब किसी और दिन। व्रत चल रहें हैं और मैंने सुबह से 'कुछ अधिक' खाया नहीं है रात्रि भोजन का समय हो गया है। आख़िर व्रत तोड़ना है भाई।


Monday, October 27, 2008

Sunday, April 6, 2008

शुभ कामनाएं

हिन्दु नव वर्ष २०६५ की हार्दिक शुभ कामनाएं !