Friday, December 25, 2009
sansad ke aam !
परन्तु...............परन्तु यह राजनीति करने वाले भी हद करतें हैं. हर दिन यह कोई ऐसा काण्ड करतें हैं कि मेरा जैसा समर्थक भी इनको जूते मारने को दौड़े. इस का लेटेस्ट उदाहरण हैं Times Of India में छपी यह खबर "No Inflation in Parliament Canteen".
संसद की कैंटीन में पाए जाने वाले पदार्थों के भाव देखिये और भाव खाईये. आम आदमी की आम सरकार के लिए आम गुठली के दाम.
समाचार साभार: अलका द्विवेदी
Saturday, October 31, 2009
सिंह का नाद !
सुनिए.................! टीवी पर शेर दहाड़ने वाला है.
Friday, October 30, 2009
हमारी छाती तैयार है !
Friday, April 10, 2009
'मित्तर प्यारे नू'
जीवन में जरा सी विषम परिस्थिति आने पर हम लोगों का ईश्वर पर विश्वास डगमगाने लगता है। "हम ने तो किसी का कभी बुरा नहीं किया फिर भगवन हमारे साथ ये अन्याय क्यों कर रहा है? हमारा तो भगवान ने भी साथ छोड़ दिया !" इत्यादि इत्यादि प्रलाप हम करना शुरू कर देते हैं। अगर यह विषम परिस्थितियाँ और अधिक कठिन हो जायें तो लगता है सारा उसी भगवान का षडयंत्र है, हम अपने को ईश्वर के ही विरुद्ध खड़ा पाते हैं ।
गुरु गोबिंद सिंह जब मुगलों के विरुद्ध संघर्षरत थे तो चमकौर साहिब के किले में औरंगजेब की फौज ने गुरूजी को उन के केवल चालीस साथियों सहित घेर लिया। उन के दो तरुण बेटे अजीत और जुझार इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। अनेक अन्य साथी लड़ाई में काम आए। जिस किले में गुरु जी और उन के शिष्यों ने मोर्चा बना रखा था उस का मुग़ल सेना के हस्तगत होना तय था। अपने बचे हुए पाँच शिष्यों के तीव्र आग्रह पर गुरु गोबिंद जी ने अनमने रातों-रात वेश बदल उस किले से निकल जाना स्वीकार किया। किले से निकल दिसम्बर की कड़कती ठण्ड में, बहुत दिनों तक गुरूजी जंगलो में अकेले भटकते रहे। मुगलों के विरुद्ध अपने लंबे संघर्ष में, अपने पिता, अपने चारों पुत्रों और अनगिनत शिष्यों के बलिदानों के बावजूद राष्ट्र, समाज और धर्म की अस्मिता विदेशी आक्रान्तायों के पैरों तले कुचली जा रही थी। आशा की कोई किरण नहीं थी। मुगलों के विरुद्ध हिंदुस्तान का युद्ध पराजय की ओर अग्रसर था, उस कठोर समय में गुरूजी की मानसिक परिस्थिति क्या रही होगी, यह उनके श्रीप्रभु को लिखे कई शब्दों में प्रर्दशित होता है। जिन में से एक मुझे बहुत प्रिये है।
मित्तर प्यारे नू, हाल मुरीदां दा कहिना ॥
तुध बिन रोग रजाईयां दा औडन, नाग निवासां दे रहिना ॥
सूल सुराही खंजर प्याला बिंग कसाइयां दा सहिना ॥
याराडे दा सानु सथ्थर चंगा पठ खेड़यां दा रहिना ॥
मेरी सीमित क्षमतानुसार इस में गुरुजी अपने उन साथियों को जो प्रभु चरणों में लीन हो गए को स्मरण कर उन से भगवान् को अपनी दशा बताने का अनुरोध कर रहे हैं : प्रिये मित्र (प्रभु) को भक्तों की दशा बताना। आप (प्रभु) बिना रजाई रोग और घर जैसे नागों के बीच रहना है । सुराही कांटे और प्याले खंजर से तेजधार हैं, (आप की अनदेखी) जैसे कसाई के हवाले होना। मित्रों (प्रभु) के घास-फूस के बिस्तर के आगे हमें महल भी आग की भट्ठी जैसे हैं।
इतनी घोर विषमता में भी उनका विश्वास ईश्वर पर अटल रहा। 'नानक नाम जहाज़ है' फ़िल्म में मोहम्मद रफी ने अपनी मोहक आवाज़ में इस शब्द को बहुत सुंदर गाया है। जिन्दगी में सब कुछ खो कर भी अपनी आशा और विश्वास बनाये रखने का गुरु गोबिंद जी का संदेश सुन मन को बहुत संबल मिलता है।
Wednesday, April 1, 2009
पारस या दीपक ?

ज्ञान दत्त पाण्डेय जी की दार्शनिक पोस्ट 'पारस पत्थर' ने मेरे मन में एक अन्य विषय चला दिया। उन्ही की बात को सादर आगे बढाते मैं सोचता हूँ कि भाग्यशाली लोगों के जीवन में कोई न कोई ऐसा व्यक्तित्व आता है जिस के आभा मंडल में उन का जीवन दर्शन बदल जाता है। व्यक्ति की सोच-विचार, जीवन-पद्धति, आचार-व्यवहार सब कुछ बहुआयामी हो जाता है। ऐसे व्यक्तित्व को पारस कहना स्वाभाविक ही है। एक बिना मूल्य के जंग खाए लोहे के कबाड़ी टुकड़े यदि ऐसा पारस छु भर ले तो वो बहुमूल्य , बहुगुणी गरिमायुक्त स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। (अब यह परावर्तन चाहे शारीरिक हो चाहे मनो:वैज्ञानिक) । कुछ लोगों का भाग्य तो इतना प्रबल होता है कि उन को अपने जीवन काल में ऐसे अनेक गुणीजनों का सानिद्ध्य प्राप्त होता है। यह विशिष्ट आत्माएं किसी दीपक जैसे अपने दिव्यप्रकाश से हमारे जैसे आम व्यक्ति के जीवन में भी उजाला कर देते हैं। तो इस दृष्टि से इन पारस सरीखे व्यक्तित्व को हम दीपक भी बुला सकते हैं।
अब मुद्दे की बात यह है कि किस का महत्त्व अधिक है, पारस का या दीपक का ? एक बारगी तो दोनों ही एक से लगते हैं। परन्तु इन दोनों में बहुत अन्तर है। पारस निश्चित ही लोहे को सोना बना देता है, परन्तु वो सोना पारस नहीं बनता। उस सोने का स्वयं का जीवन तो बदल जाता है परन्तु वो किसी और लोहे के टुकड़े को सोना नहीं बना सकता। पारस लोहे को सोना तो बना देता है परन्तु अपने इस विशिष्ट गुण को किसी और को नही देता। यहाँ पारस की सार्थकता कम हो जाती है। और दूसरी ओर एक दीपक अनेक दीपक जला सकता है और वो प्रकाशित दीपक अन्य हजारों दीपक जला हजारों व्यक्तियों के जीवन में प्रकाश ही नहीं लाते बल्कि उन को आगे वो प्रक्रिया बढ़ाने का अपना विशेष गुण भी देते हैं।
तो मुझे लगता है कि अपने जीवन में दैवयोग से आए ऐसे महाजनों से हम दीपक बन गुण ग्रहण करें ताकि उन के वो आदर्श विचार और दर्शन हम केवल अपने तक सीमित न रख सम्पूर्ण समाज को प्रकाशमान कर सकें और यह प्रक्रिया सतत् चलती रहे। आज के इस घोर कलयुग में हमें ऐसे अधिक से अधिक दीपकों की आवयश्कता है।

Sunday, March 15, 2009
'चाँद मेरा दिल'
मैंने अब उपन्यास बंद कर अपने ऐसे क्रिया-कलापों का हिसाब लगना शुरू किया जिस के बदले उस के यह अग्नि-बाण हो सकते थे। परन्तु मुझे ऐसी कोई हरकत ध्यान न आयी कि जिस की बात्तें सुनना अभी बाकी हों। 'अरी भाग्यवान, हुआ क्या ? ' मैंने अन्तत: पुछा। उस ने मेरी और ऐसे देखा जैसे मैं सब जानते हुए भी अनजान बन रहा हूँ। 'अब बतायो भी, क्या हो गया, और जरा सब्जी दे दो' मैंने सहजता से बोला। "आखिरकार पत्नी ही काम आती है" उस ने जैसे कोई किला जीतने के बाद सूचना दी हो। "जो यह तुम ज्यादा गलैमरस औरतों के पीछे भागते हो न, आखिर मुंह ही काला होता है।" अब वो मुझे ऐसे समझा रही थी जैसे प्राथमिक कक्षा की टीचर बच्चे को कोई अक्षर समझा रही हो। मेरा दिल जोर से धड़का, मेरा ऐसे कौन सा चक्कर था जिस के बारे में मुझे ही ख़बर न थी। 'अरे तुम क्या कह रही हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा" मैंने झुंझला कर कहा। "हाँ हाँ तुम्हे कोई बात क्यों समझ आने लगी, वैसे तो बड़े अपडेटिड बनते हो , सारा दिन अख़बारों में सर दे रखते हो, पर यह बात समझ नहीं आ रही" उस ने मेरा पलस्तर उखाड़ना शुरू कर दिया था। "अरे मेरी आशकी का कोई फसाना किसी अखबार में छप गया क्या ?" मेरा धैर्य अब जवाब दे रहा था। "तुम्हारा फसाना भी छप जाएगा किसी दिन, आजकल बहुत सज-धज कर जाते हो" उस ने त्योरी चढ़ा ललिता पवार जैसे ताना मारा। "मैं तो हमेशा ही सजा-धजा रहता हूँ, इस में क्या है ?" टेबल से उठते मैंने कहा। "हाँ हाँ, हमेशा ही सजे रहते हो कि क्या पता कब कौन सी टकरा जाए।" मेरे पीछे पीछे वो बाथरूम तक आ गई, स्पष्ट था वो विषय समाप्त करने के मूड में नहीं थी। "अरे मेरे ऐसे भाग्य कहाँ जो कोई हसीना टकरा जाए" हाथ धोते धोते मैंने उसे चिढाने के लिए कहा। "ज्यादा उड़ो मत, जिन के ऐसे भाग्य हैं उन पर क्या बीतती है, जानते हो ? उस ने कहा। "ओफो, अगर कुछ कहना है तो कहो वरना मैं चला" मैंने धमकाने का थका सा प्रयास किया।
"आख़िर बीवी के पास ही आना पड़ा ना ?" उस ने मुझे चिडाते हुए पूछा ? "किसे?? मुझे?" मैंने झुंझुला कर पूछा । "अरे तुम किस खेत की मूली हो," उस ने मुझे उपेक्षा से देखते हुए कहा, "मैं उस मुह्जले चाँद मोहम्मद की बात कर रही हूँ।" आख़िर उस ने रहस्य से परदा उठाया और मैंने जरा चैन की साँस ली। "मुंह काला करवा कर घर लौटना पड़ा ना ?" उस ने विजेता भाव से एक त्योरी चढा कहा। "ठीक है यार, पर इस में मैं कहाँ फिट होता हूँ, तुम मेरी चढाई क्यों कर रही हो' ?" मैंने तंग आ कर पूछा । 'ये सबक हैं तुम जैसे मर्दों के लिए, कुछ सीखो, पत्नी पत्नी ही होती है, आख़िर उस के पल्लू में ही सर छुपाना पड़ता है। घर गया, मान गया, धर्म गया, सारी उम्र की बनाई साख गयी, अगली ने पैसा बनाया और काम ख़तम।" वो बिना रुके प्रवचन कर रही थी और मैं ऐसे मुंह बनाये बैठा था जैसे किसी सत्संग में कोई लाउड स्पीकर वाला जबरदस्ती कथा सुनता है।
वो बोलती जा रही थी और मैं मन में चन्द्रमोहन को कोस रहा था जिस ने ख़ुद तो मजे लिए और हमारे जैसों के लिए भाषण छोड़ गया। अगर पछताना ही है तो लड्डू खा कर पछताना बेहतर नहीं? वो ठीक कह रही थी बहुत सारे मर्दों ने इस प्रकरण से सबक लिया होगा...................... किस तरह से इस परिस्थिति को आने नहीं देना है और अपना चक्कर चुप-चाप चलाना है। आमीन।
Sunday, October 12, 2008
'कूल' युवा !
यह लेख मैं मोटोरोला 'युवा' मोबाइल फ़ोन के उस नवीनतम विज्ञापन को समर्पित करना चाहता हूँ जिस में कक्षा में पढ़ा रहे एक शिक्षक का उपहास किया गया है। सदियों पुरानी घिसी पिटी भारतीय (कृपया यहाँ 'इंडिया' पढ़ें) संस्कृति को चमचमाती सुनहरी पन्नी में लिपटी अमेरिकी संस्कृति (कृपया यहाँ 'कल्चर' पढ़ें ) के समकक्ष खड़ा करने के कुछ लोगों के प्रण के निमित्त यह एक अन्य भगीरथ प्रयास हैं।
अपने बाल्यकाल में अंग्रेजी फिल्मों में जब किसी कक्षा का चित्र देखता था तो बहुत आश्चर्य होता, किस प्रकार विद्यार्थी अपने शिक्षक की उपस्थिति को अनदेखा कर अपने मन की करते थे और शिक्षक एक भोंदू जैसे उन विद्यार्थियों की उपस्थिति को अनदेखा कर श्यामपट पर लिखते रहने का अपना कर्म काण्ड पूर्ण करता रहता। केवल इतना ही नहीं बल्कि इस से भी बढ़ कर शिक्षक के सामने ही छात्र अपनी सहपाठी छात्रा को अपने प्रेम का प्रमाण उस के अधरों पर भी दे देता और देता रहता। इसी तरह की कुछ पावन भावना विद्यार्थी और शिक्षक के बीच में भी देखी जा सकती थी। उस समय वोह सब देख कर मुझे अपने पिछडेपन का तीव्र एहसास होता ठीक उसी तरह जिस प्रकार बीजिंग ओलोम्पिक में चीन के पदक देख किसी भारतीय को होता है। किस प्रकार अमेरिका ने समाज में सारे भेद-भाव दूर कर दिए हैं। छोटे बड़े, ऊँचे नीचे का कोई भेद नहीं। हमारे यहाँ तो वही गुरु शिष्य की धकियानुसी कहानियाँ आज भी चलाने की कोशिश की जा रही थी। खैर अब घबराने और शर्मिंदा होने जरूरत नहीं है, हमारी बासी संस्कृति को अत्याधुनिक सैलून में पेंट पोलिश कर अल्पतम कपडों में सजा कर सेक्सी बनाने का पुनीत कार्य अब बड़े बड़े राष्ट्रभक्तों ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। अब हम भी सर उठा कर कह सकते हैं कि हम आधुनिक और शिक्षित हो गए हैं अब हम संस्कार - कुसंस्कार के तुच्छ मापदंडों से ऊपर उठ रहें हैं तथा शेष जल्दी ही उठ जायेंगे।
इसी प्रक्रिया के तहत 'कल हो न हो' जैसी फिल्मों में शाहरुख जैसे नवीन देव बच्चों को अपनी दादी में सेक्सी छवि देखने को कहते हैं, इसी योजना के अंतर्गत एक कक्षा में अध्यापिका छात्र द्वारा एक विशेष परफ्यूम लगाने पर अपना चेतन खो देती है और इसी योजना के परिणाम स्वरुप इस प्रकार के प्रेरक विज्ञापन हमारे सामने परोसे जा रहे हैं। एक युक्ति के तहत ही इस वृति के युवा वर्ग को 'कूल' और 'हाट' बताया जाता है तथा अपनी पढ़ाई के प्रति गंभीर विद्यार्थियों को भोंदू। धोनी भी तो कहता है ना, "पढाई में कुछ ख़ास नहीं था"।
परन्तु यहाँ एक बात बहुत ही रोचक और विचारणीय है। क्या एक भी व्यक्ति ऐसे 'कूल' विद्यार्थी जीवन से निकलने वाले डॉक्टर के हाथ में अपना या अपने किसी प्रिये का जीवन देना चाहेगा या ऐसे ही किसी 'हाट' विद्यार्थी से इंजिनियर बने के हाथ अपना ड्रीम प्रोजेक्ट ? शायद कभी नहीं। एक और बात, जिस प्रकार का चित्र हम एक शिक्षक का प्रस्तुत कर रहें हैं कौन समझदार इस क्षेत्र में अपना जीवन नष्ट करने की सोचेगा और क्यों ?

Wednesday, August 20, 2008
छोट्टी बहन !
"आप अपनी सेहत का ध्यान रखा करें। " मेरे मामा ने मेरी मां को आग्रह किया। उस दिन मैंने ध्यान दिया कि वो अपने से छोट्टी बहन को 'आप' कह संबोधित करतें थे। पहले ऐसा नहीं था । पहले वो उन कि छोट्टी बहन ही हुआ करती थीं। मेरी कल्पना में वो भी बचपन में साथ साथ खाते पीते, हँसते खेलते, लड़ते झगड़ते रहे होंगे। छोट्टी बहन की छोट्टी बड़ी जिद्दों को बड़े भाई ने लाड दुलार से पूरा किया होगा। क्या तब भी उन्होंने उसे 'आप' कह पुकारा होगा, मेरे मन ने शुन्य में प्रश्न किया और स्वयं ही उत्तर दिया, 'कभी नहीं'। फिर ये परिवर्तन कब आया होगा ? परन्तु मेरी व्यवहारिक बुद्धि इस का उत्तर जानती थी।
मेरे मामा का वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था। पत्नी का परिवार पर अनुचित नियंत्रण था तथा पति हाशिये पर धकेल दिया गया। संतान ने भी पिता का साथ कभी न दिया। दुर्दैव ने परिवार की सारी सुख-समृधि निगल ली। संतानों की शिक्षा, उन की शादियाँ , कारोबार कुछ भी संतोषजनक नहीं था। और फिर एक दिन परिवार ने मेरे मामा को एक प्रकार से अलग कर दिया। अपना बनायो अपना खायो। जीर्ण शीर्ण से हवेलीनुमा पुश्तैनी मकान की निचली मंजिल की अँधेरी कोठरी में वो अपने जीवन के अन्तिम चरण के दिन गुजारने लगे। रिश्तेदारों अपनी सामर्थ्येनुसार सहायता की परन्तु "यहाँ सब के सर पे सलीब है' के नियम के अंतर्गत कौन कितने दिन सहायता कर सकता है। तो कभी कोई तो कभी कोई, उन के दिन, सप्ताह या महीने का प्रबंध कर देता। कभी शहर में सब से अधिक फैशन करने वाला आज रिश्तेदारों या मित्रों के दिए कपडों से गुजरा करता । महीने दो महीने में वो अपनी छोट्टी बहन के पास सहायता के लिए आ जाते और वो अपनी योग्यता अनुसार उन की सहायता कर देती।
और इस अनुकम्पा ने कब 'छोट्टी' को 'आप' बना दिया, शायद किसी को पता ही नहीं चला।
Sunday, July 6, 2008
अमर चित्र कथा

अफजल खान के कटे हुए सर को अपने भाले पर टांग गर्व से विजय प्रदर्शन करते अपने मराठा सैनिकों को देख वीर शिवाजी ने तुंरत उन्हें टोकते हुए कहा, "अपने मृत शत्रु का अपमान करना हमें शोभा नहीं देता। अफजल खान का ससम्मान अन्तिम संस्कार होना चाहिए।" अमर चित्र कथा के शिवाजी अंक के यह शब्द मुझे सचित्र ध्यान हैं। केवल यही नहीं अपितु और भी बहुत से अंक मेरे मन मष्तिष्क पर उन के रंगीन चित्रों सहित गुदे हुये हैं।
राज जी की पोस्ट, चिंतन को पढ़ अमर चित्र कथा मेरी आंखों के आगे घूम गयी। बाल्यकाल में (माशाल्लाह मैं तो अभी भी बालक सा ही अनुभव करता हूँ) मैंने अनगिनत अंक पढ़े होंगे और कई अंक अनगिनत बार पढ़े होंगे। कई कई घंटे मैं उन पुस्तकों से चिपका रहता था। भारतीय इतिहास माला का शायद ही कोई नायक होगा जिस का अंक मैंने नहीं पढ़ा होगा। केवल पढ़ा ही नहीं मेरा बाल मन उन चित्रों को देख उसी प्रवाह में बह जाता था और मैं भी गोरा-बादल जैसे चित्तोड़गढ़ के किले से रानी पद्मिनी पर बुरी नजर रखने वाले अल्लाउद्दीन खिलजी के शिविर पर टूट पड़ने को आतुर हो जाता। मैं भी अपने आप को महिरावण की कैद से रामजी को छुडाने के लिए मक्खी बने हनुमान के साथ उड़ता पाता। नरेन् का सभी से प्रभु देखे होने का प्रश्न करना तथा स्वामी परमहंस का बिस्तरे नीचे धन के कारण चिंहुक उठाने का चित्र आज भी मेरी आंखों के सामने स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसे कई प्रसंग मेरी स्मृति में स्थाई रूप से अंकित हैं। इन्ही के साथ अमर चित्र कथा की जातक कथाएँ, पंचतंत्र की कहानियाँ, हितोपदेश इत्यादि सम्मिलित हैं। मुझे ध्यान हैं कि मेरे पिता जी ने उस समय मेरे लिए किराये पर पुस्तकें पढने के लिए मासिक शुल्क की व्वयस्था कर रखी थी।
और केवल अमर चित्र कथा ही नहीं, बल्कि नंदन, चंदामामा, बाल-भारती की छोटी व् सरल जीवनियाँ मेरी पठनीय पुस्तकों में थी। ऐसा नहीं है की मैंने चलता फिरता प्रेत बेताल या जादूगर मेंड्रेक या फ्लैश गोर्डोन या जासूस रिप किर्बी या बहादुर या मधु मुस्कान और टिंकल का कोई भी अंक छोड़ दिया हो परन्तु अमर चित्र कथा का स्थान मेरी पढ़ी पुस्तकों में सब से ऊँचा है। भारतीय बाल वर्ग को अमर चित्र कथा एक अनमोल उपहार है और अगर इन पुस्तकों को भारतीय शिक्षा पद्दति में जोड़ दे तो मैकाले विष से ग्रसित, भारतीय संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने वाली हमारी युवा पीढी शायद भारतीय वैभव पहचान पायें।

विदाई !
मित्र की विदाई में आयोजित एक समारोह में दुसरे मित्र ने अपने संदेश में कहा, "कुछ शत्रु जब मिलते हैं तो जान ले लेते हैं, और कुछ मित्र जब बिछुड़ते हैं तो प्राण ले लेते हैं।" उन्होंने बहुत भावुक हो मुझे यह बात सुनाई । विदाई कार्यक्रम इन्ही का था और वो भी आज से बीस बरस पहले। "और कारण चाहे जो भी रहा हो लेकिन उस विदाई समारोह एक लगभग एक महीने के बाद वो स्वयं अपनी देह त्याग इस संसार से विदा हो गये। मेरे मन में यह शब्द उन के अन्तिम शब्दों जैसे अंकित हो गए। प्रणय, इन बीस वर्षों में तुम दुसरे व्यक्ति हो जिस से मैंने यह बात की है।" अपने भाव छिपाने के लिए उन्होंने चाय का प्याला मुंह से लगा लिया। और कुछ देर के लिए हम दोनों चुप हो गए।

Wednesday, June 18, 2008
पुण्य स्मरण:

अनायास ही उन के मित्र ने पूछा कि वे कुछ उदास लग रहें हैं क्या बात है ? चौंक कर मैंने भी रियर व्यू मिरर में उन का 'उदास' चेहरा देखने का प्रयास किया। सामने से आने वाली गाड़ियों के प्रकाश में सच ही वे कुछ भावुक से लग रहे थे। "मेरे ऊपर कुछ समय इस छात्रावास के संरक्षक की जिम्मेवारी रही है" उन्होंने शुन्य में निहारते कहना शुरू किया। "उस समय इस छात्रावास के बच्चों के वार्डन के रूप में एक परिपक्व दम्पति नियुक्त था । इस बीच मेरी व्यस्तता बढने के कारण काफ़ी समय मेरा यहाँ आना नहीं हुआ। आज इतने दिनों के बाद आने पर पता चला कि प्रबंध समिति ने उस दम्पति के स्थान पर एक तरुण युवक को नियुक्त कर दिया है।" वे निश्चित ही उदास स्वर में बोले थे।
मैं अभी भी उन की चिंता का कारण न समझ हैरान हो रहा था और एक पल साँस ले वे फिर बोले, " महिलाएं संवेदनशील होतीं हैं और बच्चे भी पुरूष की अपेक्षा किसी महिला से अधिक स्नेह रखतें हैं । वो दोनों पति पत्नी बड़े मनोयोग से बच्चों की संभाल करते थे। बच्चे भी उस महिला को अपनी माँ समझ दुःख सुख कह लेते होंगे। परन्तु यह अविवाहित नया वार्डन कैसे बच्चों की देखभाल कर पायेगा ? रात्रि में सोने के समय बत्तियां बुझा अपने कमरे में सो जाता होगा । उस को कल्पना भी नहीं होगी कि किसी बच्चे को उस की जरुरत होगी। पॉँच साल का वो नन्हा बालक जब रात को अपनी मां को याद कर रोता होगा तो कौन उसे सीने से लगा चुप कराता होगा ? " इस के आगे वे कुछ नहीं बोले न ही हम में से कोई कुछ कह पाया। हवा एकदम नमी से भर गयी लगती थी।

Saturday, April 26, 2008
वाह विवाह !
वैसे तो सोचने में ये ओछा ही लगता है, पर मैं उस विवाह पर आए संभावित खर्च के विषय में सोच रहा था। बात केवल नरेश के विवाह की नहीं है। प्राय: सभी हिमाचली ग्रामीण विवाह अत्यंत सादे व तड़क भड़क से परे होतें हैं। बहुत अधिक लेनदेन नहीं होता, कपड़े लत्ते या आभूषण अपने सामर्थ्य अनुसार और संगीत के नाम पर कान फोडू , कर्कश और भद्दे फिल्मी गानों की बजाय स्थानीय कर्णप्रिये लोक संगीत ही होता है। दावत पर खिलाए जाने वाली धाम में भूमि पर आसीन आतिथिओं को सदैव पत्तल में दाल भात ही रहता है चाहे किसी भी स्तर का व्यक्ति क्यों न हो। तो फिर चाहे कितने भी बाराती हों, मेजबान की जेब और चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती। अन्यथा भी स्नेहपूर्वक खिलाए जाने वाला साधारण दाल भात, धक्के मुक्की से प्राप्त होने वाले छप्पनभोगों से कहीं अधिक स्वादिष्ट व तृप्तिदायक होता है।
खैर बात हो रही थी शादी पर आने वाले खर्चे की। मेरे अनुमान से इस विवाह पर अधिक से अधिक तीस या चालीस हजार का व्यय हुआ होगा। ऐसा नहीं है कि यह परिवार संपन्न या शिक्षित नहीं था, वर स्वयं अधिवक्ता, उस का अग्रज निर्माण विभाग में अभियंता तथा पिता सेवानिवृत सरकारी अधिकारी थे। परन्तु सादगी ग्रामीण क्षेत्रों में दैनिक जीवन पद्दति है।
लेकिन क्या हम कल्पना कर सकते हैं इस प्रकार की सादगी शेष उत्तर भारत में? विशेषकर पंजाब में अनावश्यक दिखावा बहुत अधिक है। नगरीय या ग्रामीण, प्रत्येक स्थान पर मिथ्या एश्वर्य का प्रदर्शन बेहूदगी की सीमा लाँघ जाता है।ऋण में सर तक डूब कर ही क्यों न अपनी शान बघारी जाए पर खर्चा लाखों करोडों से कम नहीं होना तय है । नवीनता के नाम पर नए नए प्रयोग हो रहें हैं। अतिथिओं के मनोरंजन के लिए अशलीलता के दरबार लगे मिलते हैं। हजारों तरह के व्यंजन व पकवान होतें हैं पर उन का सेवन वही कर सकता है जिस ने अपनी गरिमा बेच खायी हो और चील से झपट्टा मारने की कला सीखी हो। शालीन अतिथि को तो भूखे पेट ही वापिस लौटना पड़ता है। आजकल तो एक नया प्रचलन चल पड़ा है कि लड़की दुल्हे को ब्याहने अपने ससुराल बारात लेकर आती है। अंतत: इस नवीन प्रथा के पीछे भी आर्थिक पहलू ही काम कर रहा है। छोटे छोटे गांवों में भी दहेज़ को लेकर झगडे हो रहें हैं। जहाँ तक मुझे ध्यान आता है, मैंने कभी हिमाचली गांव में दहेज़ संबंधित विवाद नहीं देखा।
यहाँ मुझे 'God Must Be Crazy' नामक फ़िल्म में वह आदिवासी परिवार की याद आती है जो 'जंगली' हो कर भी पूर्णतया: प्रसन्न और संतोषी था, परन्तु एक दिन किसी पायलट द्वारा फेंकी गयी कोला की खाली बोतल के कारण झगडे का केन्द्र बन जाता है, और फिर उस परिवार का मुखिया उस 'मुसीबत की जड़' बोतल को दुनिया के अन्तिम किनारे से नीचे फेंकने का संकल्प लिए हजारों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल निकल पड़ता है।
तो शायद हम लोग भी आधुनिकता व तथाकथित शिक्षित होने के ढोंग में अपना जीवन जंजाल बना रहें हैं। हर कोई मन में कुछ, चेहरे पर कुछ और वाणी में कुछ और लिए बनावटी जिन्दगी जी रहा है तथा इस आपाधापी में अपनी सही पहचान भूल गया है। कभी कभी मैं सोचता हूँ कि आजकल घर से निकलने के समय हमें कितनी सारी चीजों का ध्यान रखना पड़ता है, रुमाल, चश्मा, चाबियाँ, घड़ी, मोबाइल, लैपटॉप, पर्स इत्यादि। सूचि और भी लम्बी हो सकती है लेकिन इस से कम तो कदापि नहीं। इन में से एक भी छुटने पर हम सारा दिन अपाहिज सा अनुभव करतें हैं। तो यह वस्तुएं हमारी सुविधा के लिए हैं या हम इन के गुलाम? लगता तो गुलामों वाला मामला ही है। यह हमारे लिए नहीं हम इन के लिए हो गए हैं। और कुछ लोग मात्र एक धोती लोटे में भी 'झकास' जीवन जीतें हैं।
साधू हो जाना सभी के लिए सम्भव नहीं है और न ही आवश्यकता, परन्तु इन गुलामी की जंजीरों को तोड़ झूठे दिखावे को त्याग यथासंभव सादगी पूर्ण जीवन जीने का प्रयास तो हम कर ही सकतें हैं। एक दो दिन कर देखें शायद सच ही हम परम संतोष अनुभव करें, देखें कहीं 'गाय न बच्छी नींद आए अच्छी ' कहावत चरित्रार्थ हो जाए।
Monday, April 14, 2008
मानव आयु !
समस्या केवल इतनी ही नहीं थी, समस्या मृतक की विधवा की भी थी। परन्तु मेरा मन तो उस वृद्ध के विषय में ही सोच रहा था। इतनी आयु में पहले तो पत्नी के छोड़ जाने का अकेलापन, और फिर अपनी आंखों के समक्ष अपने पुत्र की मृत्यु । इतना ही नहीं तो अपनी ही संभाल कर पाने में शारीरिक असमर्थता , याने दैनिक नित्यकर्मों में किसी अन्य व्यक्ति की सहायता की दरकार। तो क्या इतनी लम्बी आयु वरदान हैं या श्राप ? आख़िर मानव आयु कितनी होनी चाहिए ?
विदेशों की विभिन्न व्यवस्थाओं की बात न करके अगर केवल भारतीय समाज का सोचें, जो अभी तक न पूर्ण रूप से अपनी प्राचीन परम्पराएँ त्याग पाया है और न ही पूर्णतया विदेशी चलन अपना सका है, तो यही मन में आता है कि आयु उतनी ही हो जितनी देर अपने हाथ पांव चलते हों या संतान के संस्कार ऐसे हों कि जीवन पर्यंत वह अपने बुजुर्गों की सेवा करें ।
Saturday, April 12, 2008
चिंता या चिंतन !

Monday, March 3, 2008
मनोगत:






