Saturday, March 21, 2009

चार्वाक सत्य जगत मिथ्या !

मानव जीवन का असली आनंद पाने का रहस्य जानने के लिए अधिकाँश लोग अध्यात्म की मुड़ जाते हैं कुछ अधिक जिज्ञासा वाले हिमालय की और प्रस्थान कर जाते हैं। परन्तु कुछ लोग इतने भाग्यशाली होते हैं जिन्हें इस रहस्य की चाबी घर बैठे ही मिल जाती है। सूद साहब ऐसे अति दुर्लभ भाग्यशाली लोगों में से एक हैं। इस में भी घोर आश्चर्य की बात यह है कि ब्रह्म-ज्ञान धारा का यह रस केवल सूद साहब ही नहीं अपितु उन के सारे परिवार ने चख रखा है। जिस संसार के गहन दु:खों को देख सिद्धार्थ बुद्ध हो गए कम्बखत वो दुःख सूद साहब का आज तक एक बाल भी न टेढा कर पाए। सांसारिक कष्टों से यह विरक्ति उन ने किस अघोरी की सेवा कर पायी है यह रहस्य हमारे लिए अनबूझा है।


दुनिया इधर से उधर हो जाए या यह कहना उचित होगा कि उन की दुनिया इधर से उधर करने का कोई लाख प्रयास कर ले परन्तु सूद साहब कभी टस से मस नहीं हुए। वो आज भी हमेशा की तरह हर सुबह अपने घर के बाहर सड़क पर किसी गाड़ी से टेक लगा बड़ी तन्मयता से अपनी छाती के सफ़ेद बाल उखाड़ते और कश लगाते आती जाती काम वाली बाईओं को घूरते। मान-अपमान, अपेक्षा-उपेक्षा और उचित-अनुचित के गणित से वो बहुत ऊपर उठ चुके हैं। अपने मन से कोई बात तुंरत धो देने की योगिक शक्ति उन ने सिद्ध कर रखी है। हमारे जैसे तुच्छ लोगों की तरह नहीं कि किसी ने 'ओये' कह दिया तो दस दिन तक मुंह लटकाए बैठे हैं। सूद साहब के घर हजारों बार लोग-बाग़ आकर सूद साहब को उन की माताजी या बहनजी का स्मरण करा चले जाते परन्तु सूद साहब किसी का बूरा न मानते। मानते होते तो उन की पुनरावृत्ति न होने देते पर यहाँ तो यह क्रम अनवरत जारी रहता है। सूद साहब की नजर में ये वो सांसारिक भोगों से लिप्त लोग हैं जो उस माया को भुला नहीं पाते जो माया उन्होंने गलती से कभी सूद साहब को सोंप दी थी। वो अज्ञानी लोग यह नहीं समझ पाते थे कि सूद साहब वो माया अपने मन मस्तिस्क से कभी की धो चुकें हैं। इन अज्ञानी लोगों की लिस्ट में राशन वाला बनिया, धोबी, दूध वाला, गाड़ी धोने वाला, गाड़ी मरम्मत वाला, कई व्यापारी, कई सरकारी कर्मचारी, काम वाली बाई आदि आदि हर जाति धर्म तथा समाज के हर वर्ग के लोग शामिल हैं। सूद साहब किसी के साथ भेद-भावः नहीं करते तथा हर किसी का समान भावः से पैसा मारते।


अगर कोई यह समझे कि शायद मैं सूद साहब से खार खाता हूँ और उन की विवशता का उपहास का रहा हूँ तो मैं यह बताना उचित समझता हूँ कि सूद साहब के घर में किसी चीज कि कमी नहीं हैं। दो गाडियां, दो कमाऊ बेटे, लाखों का अपना फ्लैट, लैपटॉप, लान, बड़ा टीवी, छोटे मोबाइल, डिजायनर कपड़े और यहाँ तक की डिजायनर कुत्ता भी है। महर्षि चार्वाक के महान सिद्धांत, "यावेत जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत' का ऐसा कठिन पालन मैंने आज तक न देखा न सुना। सूद साहब का व्यापार आज तक किसी को समझ नहीं आया, उन का आफिस तो है परन्तु किस चीज का, यह उन के आफिस के पड़ोसी भी नहीं जानते। उन को जानने वाले लोग उन का जिक्र आते ही स्वत: अपने को मुस्कराता पाते। जितना मैं समझ पाया सूद साहब की असली प्रेरणा उन की अपनी पत्नी थी जो समाज के सारे विरोध, तानों और गाली-गलोच को मन से धो देने में सूद साहब की बहुत सहायता करती। इस के अतिरिक्त जो प्रेरणा सूद साहब की पत्नी न दे पाती उस के लिए सूद साहब ने अलग से व्यवस्था कर रखी थी।


आज तक कभी सूद साहब के घर से सोसाएटी का मासिक शुल्क कभी नहीं आया था। उन ने नाम के नोटिस सोसायटी के सुचना पट्ट पर सालों से नियमित रूप से चिपके रहते । परन्तु यह तो सौ-दो सौ की छोटी सी बात थी, हैरानी तो तब हुए जब हमारी सोसायटी के प्रबुद्ध सदस्यों ने जो सदैव भारतीय राजनीती में भ्रष्टाचार से खिन्न रहते, प्रशासन में साफ सुथरी छवि वाले लोगों की मांग करते थे , मिसेज सूद को सोसायटी के वाइस प्रसीडेंट पद की नियुक्ति दे दी। नियमित रूप से मासिक शुल्क वालों के लिए इस से बड़ा तमाचा क्या हो सकता था? अब मिसेज सूद दनदनाती चलती और व्यवस्था ठीक करने का भाषण देती। एक बार एक बड़ी मजेदार बात हुयी। मैं अपने एक व्यापारिक पार्टी के पास उस के आफिस बैठा था जब उस ने मुझे एक पत्रिका देखने की लिए दी। उस वर्ष शहर में हुए व्यापारिक मेले में उन के स्टाल के चित्र उस पत्रिका में थे। पत्रिका देखते देखते मैंने एक चित्र में उन के स्टाल पर सूद साहब को खड़े पाया। मैंने अपनी स्वत: वाली मुस्कान दबाते उस व्यक्ति से पुछा कि यह आदमी केवल दर्शक है या कुछ और। मेरा इतना कहना था कि उन साहब ने चाय का पुन: आदेश दिया तथा मुझे आधा घंटा और बैठना पड़ा।


दूसरों पर मुस्कराते और सूद साहब के पड़ोसी हुए मुझे दस- बारह साल हो गए। इन दस सालों में मैंने कैसे अपनी माया उन से बचा रखी थी मैं जानता हूँ। जाने कैसे कैसे बहाने बना मैं उन का मुझ से कोई आर्थिक व्यवहार करने का कोई भी तरीका नहीं चलने दे रहा था। परन्तु बकरे की अम्मा कब तक खैर मानती । मेरा अपना पैसा बचाने का प्रयास उन के मेरा पैसा मारने के प्रण से कमजोर निकला। दो महीने पहले वो मेरे घर पालथी मार मुझे कुछ व्यापारिक विक्रय करने के लिए मना ले गए। मैं इस अहसास के साथ की शायद मेरे से लिहाज कर वो कुछ शर्म रखेंगे मैंने उन्हें उन की इच्छानुसार सामान दे दिया और वो मेरे हाथ दो दिन की तारीख का चैक पकड़ा गए। आज दो महीने बाद भी जब मेरा कोई कर्मचारी वो चैक ले बैंक जाता है तो बैंक का टैलर उसे देख स्वत: मुस्कुरा देता है।


अभी अभी ताजा ख़बर आयी कि कल शाम दो तीन दूध वाले मिल कर सूद साहब के घर से कुछ बर्तन उठा ले गए। अपने महीनो के पैसे न मिलने के कारण। परन्तु सूद साहब आज सुबह भी अपने सफ़ेद बाल उखाड़ते वहीँ खड़े थे और मिसेज सूद जमादार को सफाई ठीक से न करने पर सोसाईटी से निकलने की धमकी दे रही थी।


"चार्वाक सत्य जगत मिथ्या " !!


Sunday, March 15, 2009

'चाँद मेरा दिल'

'घूम घुमा गधी फिर पीपल नीचे ही आ गयी न।' उस ने जैसे कोई घोषणा की हो। हालाँकि अपने उपन्यास पढ़ते पढ़ते नाश्ता करते मैं उस का तमकना न देख पाया। 'तुम्हारा भी कोई भरोसा नहीं है..................' काफी देर से वो हमेशा की तरह कुछ बड़बड़ कर रही थी और मैं हमेशा की तरह खाली हूँ - हूँ कर अपना कर्तव्य पूरा कर रहा था। मेरी थाली में पटके गए परांठे ने अब मुझे उस की बात्तों को ध्यान से सुनने को मजबूर कर दिया। अगर मैं उस की और ध्यान न देता तो निश्चित ही अगला परांठा और भी जोर से गिरने वाला था। गुस्से में आवाज के साथ साथ डायनिंग टेबल से रसोई तक की उस की चाल भी काफी तेज हो गयी थी। "...........................आख़िर मर्द हो।" मैंने सुना।

मैंने अब उपन्यास बंद कर अपने ऐसे क्रिया-कलापों का हिसाब लगना शुरू किया जिस के बदले उस के यह अग्नि-बाण हो सकते थे। परन्तु मुझे ऐसी कोई हरकत ध्यान न आयी कि जिस की बात्तें सुनना अभी बाकी हों। 'अरी भाग्यवान, हुआ क्या ? ' मैंने अन्तत: पुछा। उस ने मेरी और ऐसे देखा जैसे मैं सब जानते हुए भी अनजान बन रहा हूँ। 'अब बतायो भी, क्या हो गया, और जरा सब्जी दे दो' मैंने सहजता से बोला। "आखिरकार पत्नी ही काम आती है" उस ने जैसे कोई किला जीतने के बाद सूचना दी हो। "जो यह तुम ज्यादा गलैमरस औरतों के पीछे भागते हो न, आखिर मुंह ही काला होता है।" अब वो मुझे ऐसे समझा रही थी जैसे प्राथमिक कक्षा की टीचर बच्चे को कोई अक्षर समझा रही हो। मेरा दिल जोर से धड़का, मेरा ऐसे कौन सा चक्कर था जिस के बारे में मुझे ही ख़बर न थी। 'अरे तुम क्या कह रही हो, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा" मैंने झुंझला कर कहा। "हाँ हाँ तुम्हे कोई बात क्यों समझ आने लगी, वैसे तो बड़े अपडेटिड बनते हो , सारा दिन अख़बारों में सर दे रखते हो, पर यह बात समझ नहीं आ रही" उस ने मेरा पलस्तर उखाड़ना शुरू कर दिया था। "अरे मेरी आशकी का कोई फसाना किसी अखबार में छप गया क्या ?" मेरा धैर्य अब जवाब दे रहा था। "तुम्हारा फसाना भी छप जाएगा किसी दिन, आजकल बहुत सज-धज कर जाते हो" उस ने त्योरी चढ़ा ललिता पवार जैसे ताना मारा। "मैं तो हमेशा ही सजा-धजा रहता हूँ, इस में क्या है ?" टेबल से उठते मैंने कहा। "हाँ हाँ, हमेशा ही सजे रहते हो कि क्या पता कब कौन सी टकरा जाए।" मेरे पीछे पीछे वो बाथरूम तक आ गई, स्पष्ट था वो विषय समाप्त करने के मूड में नहीं थी। "अरे मेरे ऐसे भाग्य कहाँ जो कोई हसीना टकरा जाए" हाथ धोते धोते मैंने उसे चिढाने के लिए कहा। "ज्यादा उड़ो मत, जिन के ऐसे भाग्य हैं उन पर क्या बीतती है, जानते हो ? उस ने कहा। "ओफो, अगर कुछ कहना है तो कहो वरना मैं चला" मैंने धमकाने का थका सा प्रयास किया।



"आख़िर बीवी के पास ही आना पड़ा ना ?" उस ने मुझे चिडाते हुए पूछा ? "किसे?? मुझे?" मैंने झुंझुला कर पूछा । "अरे तुम किस खेत की मूली हो," उस ने मुझे उपेक्षा से देखते हुए कहा, "मैं उस मुह्जले चाँद मोहम्मद की बात कर रही हूँ।" आख़िर उस ने रहस्य से परदा उठाया और मैंने जरा चैन की साँस ली। "मुंह काला करवा कर घर लौटना पड़ा ना ?" उस ने विजेता भाव से एक त्योरी चढा कहा। "ठीक है यार, पर इस में मैं कहाँ फिट होता हूँ, तुम मेरी चढाई क्यों कर रही हो' ?" मैंने तंग आ कर पूछा । 'ये सबक हैं तुम जैसे मर्दों के लिए, कुछ सीखो, पत्नी पत्नी ही होती है, आख़िर उस के पल्लू में ही सर छुपाना पड़ता है। घर गया, मान गया, धर्म गया, सारी उम्र की बनाई साख गयी, अगली ने पैसा बनाया और काम ख़तम।" वो बिना रुके प्रवचन कर रही थी और मैं ऐसे मुंह बनाये बैठा था जैसे किसी सत्संग में कोई लाउड स्पीकर वाला जबरदस्ती कथा सुनता है।



वो बोलती जा रही थी और मैं मन में चन्द्रमोहन को कोस रहा था जिस ने ख़ुद तो मजे लिए और हमारे जैसों के लिए भाषण छोड़ गया। अगर पछताना ही है तो लड्डू खा कर पछताना बेहतर नहीं? वो ठीक कह रही थी बहुत सारे मर्दों ने इस प्रकरण से सबक लिया होगा...................... किस तरह से इस परिस्थिति को आने नहीं देना है और अपना चक्कर चुप-चाप चलाना है। आमीन।





Tuesday, December 16, 2008

'जाति ऊँची रहे हमारी'

चेन्नई के एक विधि कॉलेज में हाल ही में हुए छात्रों के जातीय संघर्ष का विडियो देख मैं सन्न रह गया। कारण चाहे जो भी रहा हो, अपराधी या पीड़ित चाहे किसी भी जाति का थे वो दृश्य बहुत ही हृदयविदारक थे। मैं अपने को काफी मजबूत हृदय का मानता हूँ और सामान्यत: रक्त देख कर मेरा मन विचलित नहीं होता परन्तु इन दृश्यों को मैं पूरा नहीं देख पाया। आधे में ही मुझे पानी पीने को उठाना पड़ा। कोई भी सुशिक्षित (वो भी विधि के छात्र) व्यक्ति इतना निर्मम, क्रूर और जंगली हो सकता है, विश्वास नहीं होता। बर्बरता में आदमयुग को भी पछाड़ दिया भारत के इन होनहार भविष्य के वकीलों ने।



पिटने वालों में अगर भारतीय छात्रों की जगह आतंकवादी होते तो शायद मुझे तसल्ली होती परन्तु दुःख तो इस बात का है कि यहाँ तो दोनों पक्ष ही 'भारत का भविष्य' थे। आपस में ही लड़ मरने वाले इन भारतीय तरुणों के लिए किसी ऐ के ४७ वाले आतंकवादी की क्या जरूरत है ? भारत को तबाह करने के लिए ऐसे दो चार कॉलेज और उन के ऐसे विद्यार्थी ही पर्याप्त हैं। इस पशुवृति वाले विद्यार्थी आगे चल न्याय अन्याय का विचार कर समाज का उत्थान करेंगे या दिन रात ऐसी ही घटनायों की कामना और सहयोग कर अपनी चांदी कूटने की जुगाड़, अंधे को भी दिखायी देता है। कॉलेज के नाम मात्र के लिए वहशी कुत्तों की तरह लड़ने वाले यह होनहार अपने नाम तक को तो सार्थक कर नहीं सकते यह तह है।


इस शर्मसार करने वाली घटना का दूसरा पक्ष चेन्नई की पुलिस है। पुलिस के दलबल के सामने ही छात्र हत्या का प्रयास करते रहे और पुलिस अधिकारी संतोष की साँस लेते शायद प्रिंसिपल के फ़ोन की प्रतीक्षा करते रहे। पर इन पुलिस वालों को भी अपराधी क्यों ठहराना, इन लोगों का भी कोई दोष नहीं । आख़िर यह लोग भी तो ऐसे ही कॉलेज स्कूलों की पैदाइश हैं। लड़ने वाले इन विद्यार्थियों का भविष्य का चरित्र हम इन पुलिस अधिकारीयों में साफ साफ देख सकते हैं। 'देश और समाज जाए भाड़ में, मेरा घर पूरा होना चाहिए' इन का धेयय रहने वाला है।


आखिरकार इस सब का दोषी कौन है ? हमारे स्कूल कॉलेज में क्या शिक्षा दी जा रही है? इस की चिंता शायद किसी को नहीं है। माता-पिता को पैसे कमाने वाली मशीन चाहिए, राजनीतिज्ञों को शिक्षा को भगवेकरण से बचाने की चिंता है और शिक्षाविदों को राजनीतिज्ञों की चापलूसी कर अपना घर चलाने की। एक ही चक्र घूम रहा है और इस चक्र में हमारी भावी पीढियां अफसर तो बन रहीं हैं पर मानव नहीं।



( हालाँकि मैं सलाह तो नहीं देता पर अगर कोई देखना चाहे तो ये शोर्य गाथा यहाँ उपलब्ध है। )



Tuesday, December 9, 2008

एक और 'स्वर्णभूमि'

अनायास ही अगर हम किसी से "स्वर्णभूमि" अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बारे पूछें तो अधिकाँश लोग भारत के ही किसी शहर की सोचेगें। परन्तु जानकार लोग जानते हैं कि यह हवाई अड्डा भारत में नहीं बल्कि थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक का हवाई अड्डा है जो कि सन् २००६ में निर्मित हुआ था।


परन्तु मैं बात इस के 'स्वर्णभूमि' नाम की विशेषता की नहीं बल्कि हाल में ही इस के प्रवेश द्वार के सामने स्थापित एक कलाकृति की करना चाहता हूँ। यह सुंदर कलाकृति है, हमारे "विष्णु पुराण" से लिए गए "समुद्र मंथन" का दृश्य। विभिन्न रंगों से चित्रित यह विशाल प्रदर्शनी बहुत मनमोहक है। विष्णु पुराण, श्रीमद भागवत और महाभारत में वर्णन के अनुसार जिस समय असुरों और दैत्यों की शक्ति का उत्थान हो रहा था और देवता वैभवहीन हो रहे थे, उस समय भगवन नारायण के निर्देशानुसार देवों ने असुरों से समझोता कर क्षीर सागर को मथ अमृतपान का निश्चय किया। मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को नेती बना स्वयं प्रभु विष्णु कच्छप बन मंदराचल के आधार बने तथा देवगण अमृतपान कर पाये। यह सम्पूर्ण दृश्य हम उस एक कलाकृति में देख सकते हैं जिसे देख वहां से गुजरने वाले लोग मंत्रमुग्द्ध हो ठिठक जातें हैं।







परन्तु जो हैरान करने वाली बात है वो यह कि थाईलैंड की मुख्य जनसँख्या हिन्दु नही अपितु मुस्लिम है । यह मुसलमान अपने पूर्वजों के हिन्दु होने का मान रखते हैं तथा हिन्दु संस्कृति को अपनी ही धरोहर मानते हैं। केवल थाईलैंड ही नहीं बल्कि मलेशिया, कम्बोडिया या इंडोनेशिया में भी हिन्दु संस्कृति का प्रतिबिम्ब देखा जा सकता है। कम्बोडिया का अंगकोर वाट और इंडोनेशिया की गरुड़ एयरलाइन्स के बारे में हम सब जानते ही है। इतना ही नहीं सामान्य रूप से भी उन समाजों में रामायण महाभारत के चरित्रों की झलक मिलती है और उन पर चित्रित नृत्य या नाटक वहां कभी भी देखे जा सकतें हैं।



परन्तु यक्ष प्रशन यह है कि क्या ऐसा कोई चित्र या कलाकृति भारत के किसी सरकारी भवन की शोभा बड़ा सकती है ? निश्चित रूप से नहीं। "ऐसा कोई भी प्रयास भारत की 'धर्मनिरपेक्ष' संप्रभुता पर खतरा होगा" मानने वालों की ही भारत में बोलबाला है। यह तथाकथित 'धर्मनिरपेक्ष' लोग ही हैं जिन ने भारत के मुसलमानों को हिन्दु संस्कृति का भय दिखा अपनी दूकान चला रखी है। और इसी कारण ही भारत का अधिकांश मुस्लिम समाज अपने पूर्वजों के हिन्दु होने के बावजूद अपने को हिन्दु संस्कृति से दूर पाता है। क्या कारण है कि जिस हिन्दु संस्कृति से थाईलैंड का मुस्लिम समाज अपने को गौरवान्वित महसूस करता है (कोई भी शर्मसार करने वाली वस्तु थाई समाज ने स्वर्णभूमि हवाई अड्डे पर न लगाई होती) उसी संस्कृति को भारत का मुस्लिम समाज अपने लिए विष मानता है? शायद न भी मानता हो परन्तु कम से कम हमारे देश का वातावरण ऐसा ही मानने को मजबूर करता है।


(चित्रों के लिए विभिन्न छायाकारों का आभार ! )


Monday, October 27, 2008

Sunday, October 12, 2008

'कूल' युवा !

यह लेख मैं मोटोरोला 'युवा' मोबाइल फ़ोन के उस नवीनतम विज्ञापन को समर्पित करना चाहता हूँ जिस में कक्षा में पढ़ा रहे एक शिक्षक का उपहास किया गया है। सदियों पुरानी घिसी पिटी भारतीय (कृपया यहाँ 'इंडिया' पढ़ें) संस्कृति को चमचमाती सुनहरी पन्नी में लिपटी अमेरिकी संस्कृति (कृपया यहाँ 'कल्चर' पढ़ें ) के समकक्ष खड़ा करने के कुछ लोगों के प्रण के निमित्त यह एक अन्य भगीरथ प्रयास हैं।


अपने बाल्यकाल में अंग्रेजी फिल्मों में जब किसी कक्षा का चित्र देखता था तो बहुत आश्चर्य होता, किस प्रकार विद्यार्थी अपने शिक्षक की उपस्थिति को अनदेखा कर अपने मन की करते थे और शिक्षक एक भोंदू जैसे उन विद्यार्थियों की उपस्थिति को अनदेखा कर श्यामपट पर लिखते रहने का अपना कर्म काण्ड पूर्ण करता रहता। केवल इतना ही नहीं बल्कि इस से भी बढ़ कर शिक्षक के सामने ही छात्र अपनी सहपाठी छात्रा को अपने प्रेम का प्रमाण उस के अधरों पर भी दे देता और देता रहता। इसी तरह की कुछ पावन भावना विद्यार्थी और शिक्षक के बीच में भी देखी जा सकती थी। उस समय वोह सब देख कर मुझे अपने पिछडेपन का तीव्र एहसास होता ठीक उसी तरह जिस प्रकार बीजिंग ओलोम्पिक में चीन के पदक देख किसी भारतीय को होता है। किस प्रकार अमेरिका ने समाज में सारे भेद-भाव दूर कर दिए हैं। छोटे बड़े, ऊँचे नीचे का कोई भेद नहीं। हमारे यहाँ तो वही गुरु शिष्य की धकियानुसी कहानियाँ आज भी चलाने की कोशिश की जा रही थी। खैर अब घबराने और शर्मिंदा होने जरूरत नहीं है, हमारी बासी संस्कृति को अत्याधुनिक सैलून में पेंट पोलिश कर अल्पतम कपडों में सजा कर सेक्सी बनाने का पुनीत कार्य अब बड़े बड़े राष्ट्रभक्तों ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। अब हम भी सर उठा कर कह सकते हैं कि हम आधुनिक और शिक्षित हो गए हैं अब हम संस्कार - कुसंस्कार के तुच्छ मापदंडों से ऊपर उठ रहें हैं तथा शेष जल्दी ही उठ जायेंगे।


इसी प्रक्रिया के तहत 'कल हो न हो' जैसी फिल्मों में शाहरुख जैसे नवीन देव बच्चों को अपनी दादी में सेक्सी छवि देखने को कहते हैं, इसी योजना के अंतर्गत एक कक्षा में अध्यापिका छात्र द्वारा एक विशेष परफ्यूम लगाने पर अपना चेतन खो देती है और इसी योजना के परिणाम स्वरुप इस प्रकार के प्रेरक विज्ञापन हमारे सामने परोसे जा रहे हैं। एक युक्ति के तहत ही इस वृति के युवा वर्ग को 'कूल' और 'हाट' बताया जाता है तथा अपनी पढ़ाई के प्रति गंभीर विद्यार्थियों को भोंदू। धोनी भी तो कहता है ना, "पढाई में कुछ ख़ास नहीं था"।


परन्तु यहाँ एक बात बहुत ही रोचक और विचारणीय है। क्या एक भी व्यक्ति ऐसे 'कूल' विद्यार्थी जीवन से निकलने वाले डॉक्टर के हाथ में अपना या अपने किसी प्रिये का जीवन देना चाहेगा या ऐसे ही किसी 'हाट' विद्यार्थी से इंजिनियर बने के हाथ अपना ड्रीम प्रोजेक्ट ? शायद कभी नहीं। एक और बात, जिस प्रकार का चित्र हम एक शिक्षक का प्रस्तुत कर रहें हैं कौन समझदार इस क्षेत्र में अपना जीवन नष्ट करने की सोचेगा और क्यों ?




Wednesday, August 20, 2008

छोट्टी बहन !


"आप अपनी सेहत का ध्यान रखा करें। " मेरे मामा ने मेरी मां को आग्रह किया। उस दिन मैंने ध्यान दिया कि वो अपने से छोट्टी बहन को 'आप' कह संबोधित करतें थे। पहले ऐसा नहीं था । पहले वो उन कि छोट्टी बहन ही हुआ करती थीं। मेरी कल्पना में वो भी बचपन में साथ साथ खाते पीते, हँसते खेलते, लड़ते झगड़ते रहे होंगे। छोट्टी बहन की छोट्टी बड़ी जिद्दों को बड़े भाई ने लाड दुलार से पूरा किया होगा। क्या तब भी उन्होंने उसे 'आप' कह पुकारा होगा, मेरे मन ने शुन्य में प्रश्न किया और स्वयं ही उत्तर दिया, 'कभी नहीं'। फिर ये परिवर्तन कब आया होगा ? परन्तु मेरी व्यवहारिक बुद्धि इस का उत्तर जानती थी।


मेरे मामा का वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था। पत्नी का परिवार पर अनुचित नियंत्रण था तथा पति हाशिये पर धकेल दिया गया। संतान ने भी पिता का साथ कभी न दिया। दुर्दैव ने परिवार की सारी सुख-समृधि निगल ली। संतानों की शिक्षा, उन की शादियाँ , कारोबार कुछ भी संतोषजनक नहीं था। और फिर एक दिन परिवार ने मेरे मामा को एक प्रकार से अलग कर दिया। अपना बनायो अपना खायो। जीर्ण शीर्ण से हवेलीनुमा पुश्तैनी मकान की निचली मंजिल की अँधेरी कोठरी में वो अपने जीवन के अन्तिम चरण के दिन गुजारने लगे। रिश्तेदारों अपनी सामर्थ्येनुसार सहायता की परन्तु "यहाँ सब के सर पे सलीब है' के नियम के अंतर्गत कौन कितने दिन सहायता कर सकता है। तो कभी कोई तो कभी कोई, उन के दिन, सप्ताह या महीने का प्रबंध कर देता। कभी शहर में सब से अधिक फैशन करने वाला आज रिश्तेदारों या मित्रों के दिए कपडों से गुजरा करता । महीने दो महीने में वो अपनी छोट्टी बहन के पास सहायता के लिए आ जाते और वो अपनी योग्यता अनुसार उन की सहायता कर देती।


और इस अनुकम्पा ने कब 'छोट्टी' को 'आप' बना दिया, शायद किसी को पता ही नहीं चला।