Saturday, April 12, 2008

चिंता या चिंतन !


ज्ञानी जन कहते हैं कि सब प्रभु पर छोड़ दो, एक क्षण की भी चिंता न करो । तथा दूसरी और उन का कहना है कि भगवान उन की सहायता करतें हैं जो अपनी सहायता स्वयं करतें हों ।

तो अपनी सहायता करने के लिए समस्या के समाधान हेतु विचार तो करना ही पड़ेगा और विचार करते समय समस्या का आगा पीछा, उस के संभावित उपाय या उन उपायों की अनुपस्थिति में आने वाले परिणाम व दुष्परिणाम सब ही तो सोचने पड़ेंगे । अब इस विचार श्रृंखला में कब मन चिंतन से चिंता में प्रवेश कर जाता है पता ही नहीं चलता। चिंता व चिंतन का अन्तर रख पाना तभी तो सम्भव है जब आप इन दोनों को पृथक रखें, परन्तु इन दोनों को पृथक रखना जैसे धूप और छाया को अलग करने जैसा टेढा काम है। चिंतन करते करते चिंता शुरू हो जाती है और शुरू हो जाती है एक नवीन समस्या जो उस चिंता के कारण होती है । तो माने यह कि चिंता से बचने के लिए इस अन्तर का बना रहना अति आवश्यक है।

अब इस अन्तर को बनाये रखना भी एक समस्या ही है, आप को हर समय ध्यान रखना होगा की आप यह अंतर बनाये रखें। तो इस का अर्थ यह रहा कि चिंता से बचने के लिए एक नयी चिंता पालनी पड़ेगी। तो अब इस नई चिंता की चिंता कौन करेगा, यह भी एक चिंता का विषय है ।



3 comments:

राज भाटिय़ा said...

आप सिर्फ़ चिंतन करो चिन्ता अपने आप मिट जाये गी, यानि अपने ईश्वर ( जो भी हे सभी धर्मॊ मे )को मानो चाहे मत, लेकिन उस का कहा मानॊ,फ़िर देखो चिन्ता कहा रहती हे ओर यह मन्दिर मस्जिद मे नही

praney ! said...

Raj Ji aap ka hardik swagat! asha hai aap ke vichar padne ko milte rahenge.

aap bilkul sahi kahten hain. Ishwar ka sath to kabhi chorda he nahin hai. Jo ho raha hai sab usi ki ichaa se, is main koi sandeh nahin.

Anonymous said...

I will not agree on it. I assume polite post. Expressly the title-deed attracted me to be familiar with the unscathed story.