Monday, April 14, 2008

मानव आयु !

आज एक बहुत ही असमंजसपूर्ण स्थिति का गवाह बना । लगभग १०० वर्षों के एक वयोवृद्ध का भविष्य तय हो रहा था। सुनने में बहुत आश्चर्य लगता है, १०० वर्षों की आयु वाले परिपक्व व्यक्ति का भविष्य ? परन्तु यह सही है।

दरअसल उस वृद्ध के लगभग ६० वर्ष की आयु वाले पुत्र का देहांत हो गया । वह वृद्ध अपने उसी पुत्र के साथ रहता था। उस वृद्ध के अन्य जीवित दो पुत्रों में से एक को अपने व्यापार से फुर्सत नहीं तथा दूसरे पुत्र ने सन्यास ग्रहण कर अपना घर बार छोड़ रखा है। वृद्ध की पत्नी की भी मृत्यु हो चुकी है तथा उस के पौत्र अपने अपने कार्यों से अन्य नगरों में रहतें हैं। तो अब यह बुजुर्ग कहाँ रहेंगे , यह उस समय का यक्ष प्रश्न था ।

समस्या केवल इतनी ही नहीं थी, समस्या मृतक की विधवा की भी थी। परन्तु मेरा मन तो उस वृद्ध के विषय में ही सोच रहा था। इतनी आयु में पहले तो पत्नी के छोड़ जाने का अकेलापन, और फिर अपनी आंखों के समक्ष अपने पुत्र की मृत्यु । इतना ही नहीं तो अपनी ही संभाल कर पाने में शारीरिक असमर्थता , याने दैनिक नित्यकर्मों में किसी अन्य व्यक्ति की सहायता की दरकार। तो क्या इतनी लम्बी आयु वरदान हैं या श्राप ? आख़िर मानव आयु कितनी होनी चाहिए ?

विदेशों की विभिन्न व्यवस्थाओं की बात न करके अगर केवल भारतीय समाज का सोचें, जो अभी तक न पूर्ण रूप से अपनी प्राचीन परम्पराएँ त्याग पाया है और न ही पूर्णतया विदेशी चलन अपना सका है, तो यही मन में आता है कि आयु उतनी ही हो जितनी देर अपने हाथ पांव चलते हों या संतान के संस्कार ऐसे हों कि जीवन पर्यंत वह अपने बुजुर्गों की सेवा करें ।


वहाँ से लोटने के बाद भी आंखों के सामने उन्ही वृद्ध का चित्र आ रहा है जैसे पूछ रहें हों "मैं अवांछित क्यों हूँ, अगर मेरी आयु लम्बी है तो इस मेरा क्या दोष है ?"



3 comments:

EYE said...

Videsh mein har insaan ko atmanirbhar hona padta hai. Isi karann 100 saal key vridh be bahut hi atma nirbhar hotein. Kuch vridh to akele rehtein hai! bharat mein yeh raviyya aney mein bahut samay lagega.

राज भाटिय़ा said...

जिन्दगी उतनी होनी चहिये जितनी हम अपने पर निर्भर रहे, अपने सारे काम खुद करे, किसी पर बओझ ना बने

praney ! said...

Sarvtha satya Eye & Raj ji !