Wednesday, April 1, 2009

पारस या दीपक ?


ज्ञान दत्त पाण्डेय जी की दार्शनिक पोस्ट 'पारस पत्थर' ने मेरे मन में एक अन्य विषय चला दिया। उन्ही की बात को सादर आगे बढाते मैं सोचता हूँ कि भाग्यशाली लोगों के जीवन में कोई न कोई ऐसा व्यक्तित्व आता है जिस के आभा मंडल में उन का जीवन दर्शन बदल जाता है। व्यक्ति की सोच-विचार, जीवन-पद्धति, आचार-व्यवहार सब कुछ बहुआयामी हो जाता है। ऐसे व्यक्तित्व को पारस कहना स्वाभाविक ही है। एक बिना मूल्य के जंग खाए लोहे के कबाड़ी टुकड़े यदि ऐसा पारस छु भर ले तो वो बहुमूल्य , बहुगुणी गरिमायुक्त स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। (अब यह परावर्तन चाहे शारीरिक हो चाहे मनो:वैज्ञानिक) । कुछ लोगों का भाग्य तो इतना प्रबल होता है कि उन को अपने जीवन काल में ऐसे अनेक गुणीजनों का सानिद्ध्य प्राप्त होता है। यह विशिष्ट आत्माएं किसी दीपक जैसे अपने दिव्यप्रकाश से हमारे जैसे आम व्यक्ति के जीवन में भी उजाला कर देते हैं। तो इस दृष्टि से इन पारस सरीखे व्यक्तित्व को हम दीपक भी बुला सकते हैं।

अब मुद्दे की बात यह है कि किस का महत्त्व अधिक है, पारस का या दीपक का ? एक बारगी तो दोनों ही एक से लगते हैं। परन्तु इन दोनों में बहुत अन्तर है। पारस निश्चित ही लोहे को सोना बना देता है, परन्तु वो सोना पारस नहीं बनता। उस सोने का स्वयं का जीवन तो बदल जाता है परन्तु वो किसी और लोहे के टुकड़े को सोना नहीं बना सकता। पारस लोहे को सोना तो बना देता है परन्तु अपने इस विशिष्ट गुण को किसी और को नही देता। यहाँ पारस की सार्थकता कम हो जाती है। और दूसरी ओर एक दीपक अनेक दीपक जला सकता है और वो प्रकाशित दीपक अन्य हजारों दीपक जला हजारों व्यक्तियों के जीवन में प्रकाश ही नहीं लाते बल्कि उन को आगे वो प्रक्रिया बढ़ाने का अपना विशेष गुण भी देते हैं।

तो मुझे लगता है कि अपने जीवन में दैवयोग से आए ऐसे महाजनों से हम दीपक बन गुण ग्रहण करें ताकि उन के वो आदर्श विचार और दर्शन हम केवल अपने तक सीमित न रख सम्पूर्ण समाज को प्रकाशमान कर सकें और यह प्रक्रिया सतत् चलती रहे। आज के इस घोर कलयुग में हमें ऐसे अधिक से अधिक दीपकों की आवयश्कता है।





5 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

सुन्दर विचार .

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

पारस और दीपक में दीपक की महत्ता अधिक मानूंगा मैं। पारस में तो टच चाहिये। सतत सम्पर्क। दीपक तो दूर दूर तक प्रदीप्त करता है वातावरण।
दोनो ही नोबल कॉंसेप्ट हैं।
बहुत सुन्दर लिखा मित्र! और लिखने वाला हम्बल है, मन्दमति कदापि नहीं! :)

मोहन वशिष्‍ठ said...

वाह जी वाह बहुत ही सुंदर विचार पेश किए हैं आपने

bhootnath( भूतनाथ) said...

haan aapne bilkul sach hi kahaa hai.. aapse sahmat hain ham bhi...ik acchhi post ke liye shukriya...badhaayi....!!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुन्दर! हम तो आपके फैन हो गये मित्र!