Thursday, April 2, 2009

चार पंक्तियाँ !

कल शाम हमारे शहर में पंडित हरी प्रसाद चौरसिया जी का बांसुरी वादन था। नवीन (एक हमफितरत मित्र) को फ़ोन किया तो उन्होंने असमर्थता जताते सुचना दी कि सांय ७:०० बजे से आस्था चैनल पर स्वामी रामदेव जी द्वारा प्रायोजित वीर रस कविता गायन का कार्यक्रम वो छोड़ना नहीं चाहते और साथ ही मुझे भी सपरिवार रात्रि भोज पर वो कार्यक्रम देखने का निमंत्रण दे डाला। नवरात्रों के उपवासों (मित्रगण जानते हैं कि यह उपवास मेरे लिए कितने भारी होतें हैं) के चलते मैं यह स्नेहिल निमंत्रण नहीं ले पाया परन्तु अपने घर कार्यक्रम देखने का तय किया। अब यह अलग विषय है कि मैं अपने ऑफिस से साढ़े आठ से पहले न निकल पाया।


घर जा टीवी लगाया तो कार्यक्रम जोर शोर से चल रहा था। मंच पर स्वामीजी के साथ कई विख्यात- कुख्यात कवि बैठे थे। आज कल टीवी -शीवी पर ज्यादा कवि सम्मलेन नहीं आते जिन कारण मंच प्रतिष्ठित अधिकाँश सज्जनों के नाम मैं नहीं जानता था । उस समय एक युवा कवि ने अपना पाठन समाप्त ही किया था और उन की कविता पाठन की समाप्ति ने मंच संचालक कवि श्री हरी ओम पंवर जी के चेहरे पर असीम चैन का रंग बिखेर दिया। मेरे मन में हर विधा के कलाकारों के लिए असीम सम्मान है, (इस का एक कारण मेरा Gemini होना भी हो सकता है, बचपन में गलती से मैंने लिंडा गुडमैन नामक एक वुमैन की किताब पढ़ ली थी जिस में उन्होंने संसार की कोई कला ऐसी न छोड़ी जो एक जैमिनी में न हो। बस तभी से मुझे हर कला से लगाव हो गया और इन वर्षों में मुझे अपने में किसी कला का कोई 'Master' तो न दिखायी दिया लेकिन 'Jack of All' सुबह शाम मिलता हैं ) और यह सम्मान कविओं के लिए विशेष है अब चाहे अपने निजी जीवन में वो कितने ही आलतू- फालतू ही क्यों न हों। मैं अपने को कवि सपने में भी नहीं समझता। दूर-दूर तक मेरे में यह हूनर नहीं है। ये अलग बात है की सुंदर बालायों (बलायों' भी पढेंगे तो चलेगा) की कुछ वाह-वाही लुटने के लिए मैंने भी कुछ शब्दों के हेर फेर करना सीख लिया है। परन्तु मैं ही जानता हूँ कि इन तथाकथित कवितायों में स्वाभाविक काव्य न हो कर गणित का ही जोड़-तोड़ है।


खैर बात हो रही थी पंवर जी के राहत भरे श्वास की। कलिष्ठ शब्दों में प्रसंशा की मिश्री के साथ साथ उन की आँखें उस युवा कवि को इतना समय लेने की लिए वहीँ भस्म कर देने को जल रहीं थीं। अब एक प्राचीन कवि ने वीर रस टपकाने के लिए स्टार्ट लिया तो लगा कि अगर सन ६२ में उन ने यह प्रयास किया होता तो शायद हम चीन युद्ध जीत गए होते। इस 'ड्रोन युद्ध' के वातावरण में उन के फेफडे उन का साथ नहीं दे पा रहे थे। कपड़े वगैहरा बदलने से निवृत हो जब मैं दुबारा सुनने बैठा तो पंवर जी जिस कवि को 'शमा' के आगे आने का निमंत्रण दे रहे थे वो भी एक ज्वलनशील युवा थे और उन के नाम के आगे डॉक्टर भी लगा था। (पूरा नाम नहीं लिखूंगा, सुना है आजकल ब्लोगरों पर भी केस हो जाता है) अब इस निमंत्रण में आग्रह कम और कम समय लेने का क्रुदन बार बार था। यह कवि लोग भी अजीब झक्खी होतें हैं। मंच के पीछे तो यह एक दूसरे का गला काटने को तत्पर होते हैं और मंच पर 'तू मेरी खुजा मैं तेरी खुजाता हूँ' के निर्मल सिद्धांत के तहत एक-दूसरे की उन कवितायों पर वाह-वाह की बौछार करते हैं जो इन्होने हजारों बार सुन रखी होती हैं ।


पंवर जी हर कवि को कम से कम समय लेने और बिना भूमिका के सीधा कविता पर आने का आग्रह करते तो दूसरी और स्वयं भूमिका बांधने में पूरा समय लेते। एक अन्य विषय इन कवियों के ऊपर अन्वेषण का है कि हर कवि अपनी विदेश यात्रायों का जिक्र जरूर करता है। पंवर जी ने भी किया तो उन के मुकाबले में इस युवा कवि ने अपने चक्कर लगाये प्रत्येक देश के शहरों की गिनती गिना दी। अपनी भूमिका में उस कवि ने संचालक के सीधा कविता पाठन की याचना की धज्जियाँ उड़ा दीं। उस के बाद भी अपनी प्रत्येक चार पंक्तियों में वो कवि जी हर पंक्ति के बाद दो पंक्तियों में जनता से समर्थन देने का आग्रह और न मानने पर खानदान तक पहुँचने की धमकी भी देते। राम-राम करते उन की कविता समाप्त हुयी ही थी कि इस अवसर की ताक में बैठे संचालक ने तपाक स्वामी रामदेव जी की दुहाई दे एक विशेष कविता पढ़ उनसे अपना पाठ समाप्त कर युद्ध विराम का पुन: असफल प्रयास किया। परन्तु इस कवि ने ठान रखा था चाहे जो हो जाए मैंने इस साले संचालक की कोई नहीं सुननी और अपनी ही सुनानी है। 'लाइव' कार्यक्रम में इस रस्सा-कशी ने पूरे कार्यक्रम को भोंडा बना दिया। मेरा सारा उत्साह इन कवियों की अनुशासनहीनता ने रद्दी की टोकरी में डलवा दिया। इस अवसरवादिता के बेशर्म प्रदर्शन में उस कवि की कवितायों का एक शब्द भी हृदय में न उतर सका। (और मैं जानता हूँ की वो एक अच्छा कवि है) अपना पूरा समय लेने के बाद उस कवि ने अपनी वेबसाइट का ब्योरा दे अपना विज्ञापन भी जारी कर दिया। अब किसी और कवि को सुनने का मेरा कोई इरादा नहीं था और न ही इस कवि का जो दूसरे कविता-पाठों के समय मंच पर अपने मोबाइल से खेलने का काम करता रहा।

समाज की कुसंगातियों को अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को दिशा देने का काम यह कवि करते हैं। परन्तु अपने ऐसे प्रदर्शन से इन की छवि उस दिशा-सूचक पट्ट से अधिक नहीं रहती जो राहगीर को दिशा ज्ञान तो देते हैं लेकिन स्वयं सारा जीवन उसी खूंटी पर टंगे रहते हैं ।

मेरा यह रोष केवल ऐसी घटनायों के प्रति है। अन्यथा ऐसे बहुत से कवि/लेखक हैं जिन से मैं प्रेरणा और संबल प्राप्त करता हूँ।


3 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

समाज की कुसंगातियों को अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को दिशा देने का काम यह कवि करते हैं। परन्तु अपने ऐसे प्रदर्शन से इन की छवि उस दिशा-सूचक पट्ट से अधिक नहीं रहती जो राहगीर को दिशा ज्ञान तो देते हैं लेकिन स्वयं सारा जीवन उसी खूंटी पर टंगे रहते हैं.
सही है .

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

बांसुरीवादन सुनना चाहिये था!

bhootnath( भूतनाथ) said...

aapne bilkul hi uchit farmaya....ab is vishay par aur kya kahun...sab kuchh to kahaa hi jaa chuka aapke dwara...!!