Friday, October 30, 2009

हमारी छाती तैयार है !




लोगों की हालत सच में बहुत खराब है. कई दर्द से तड़प रहे हैं. बहुत सारों को सीने में जलन और आँखों में चुभन की शिकायत हो रही है. कई कलाकारी के कलाकार 'मुझे नींद न आये' के डुएट गा रहे हैं और कुछ इस से भी बढ कर 'मर जावां' गीत के अंतिम अंतरे पर हैं. पर अब कुछ उम्मीद के बादल दिखाई दे रहें हैं. अब इन दर्द से तड़प रहे सज्जनों के दर्द की दवा का प्रबंध होने के आसार हैं.

इन सबों की तकलीफ का कारण और निदान एक बुड्ढा है. मुयाफ़ कीजियेगा, एक सम्मानित सज्जन हैं जो एक कलाकार हैं. वोह बहुत सुन्दर चित्र बनाते हैं. खासकर लोगों के माँओं के. नहीं नहीं हिंदूं लोगों की माँओं के. परन्तु इन की विशेषता नंगे  चित्रों बनाने में ही है क्योंकि वो ही आर्ट है. हाँ अगर अपनी अम्मा या बहन की पेंटिंग बनानी हो तो आर्ट के मायने बदल जातें हैं. फिर यह उन की एक ऊँगली भी नंगी नहीं दिखाते. सच ही यह बहुत महान कलाकार हैं. कुछ सरफिरे, मार्डन आर्ट से अनपढ़ तथाकथित हिन्दुओं ने इन पर इतने मुकद्दमे कर दिए कि इन साहब को विदेश भागना पड़ा.  उन हिन्दुओं को इतना नहीं पता कि हिन्दु धर्म कितना सहिष्णु है. कोई चाहे जितना भी जूते मरता रहे, अपमान करता रहे, सहिष्णुता के नाम पर उसे दांत निकाल निकाल कर सहते रहो यही हिंदुत्व है. बरखा दत्त सरीखे कितने ही बुद्धिजीवी इन अनपढों को समझाते हैं पर यह धर्म के ठेकेदार अपनी दुकानदारी चमकाते रहते हैं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह कभी नहीं समझ सकते. बेवकूफ लोग !

अब हुसैन साहब तो अपनी दाढ़ी में हाथ फेरते निकल गए और जिन बुद्धिजीवी लोगों की व्यक्तिगत  माँओं के नंगे चित्र बनाने का वायदा (अडवांस लेकर) वो कर गए थे उन लोगों के दिल हुसैन की याद में तड़प तड़प कर ब्लड प्रेशर बढा रहे थे. वो लोग तब से उन के वापिस आने कई राह देख रहे थे और उन पर मुकद्दमे करने वालों को बददुया देते ठंडी आहें भर रहे थे. भारत की सम्पूर्ण कला हुसैन के बिना किसी कोने में बैठी बलगम वाली खांसी खांस रही थी और भारत की 'सेकुलर' छवी' (जो हिन्दु अस्मिता के अपमान की टानिक पर ही जिन्दा है) धूमिल हो रही थी.  अच्छा है उन्होंने हिन्दु देविओं के ही अश्लील चित्र बनाये और केवल मुकद्दमे ही झेले क्योंकि अगर उन्होंने किसी मुस्लिम या सिख गुरु का ऐसा अपमान किया होता तो मुकद्दमे की नौबत ही न आती और तब न ही किसी बुद्धिजीवी ने आर्ट या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करनी थी.  इतना तो हुसैन भी समझतें हैं इसी लिए तो धडाधड चित्र पर चित्र बनाते रहे.

खैर सुना हैं अब हुसैन साहिब वापिस आ रहें हैं. अब इतने सारे बुद्धिजीवियों  की आत्माविहीन देहों को चैन मिल जायेगा. अब और कई ड्राइंग रूम हुसैन के पेंटिंग से सज अपनी आधुनिकता का परिचय दे इठला सकेंगे. जो हुसैन से चिढतें हैं चिढतें रहें, काले झंडे दिखाते रहें, इस से ज्यादा क्या उखाड़ लेंगे? आखिर
 देश की कला और सेकुलरता जयादा महंगी है. जितनी कीमत सारे हिन्दु धर्म की श्रद्धा की नहीं उस से सौ गुना महंगी तो हुसैन की एक पेंटिंग बिकती है. इस लिए आप भाड़ में जाईये और हुसैन की गजगामिनी बनाने आयी इस षोडशी को आगे आने दीजिये.

 आईये हुसैन जी आईये और हमारी छाती पर मूंग दलिये. क्योंकि हम हिन्दु हैं, सहिष्णु हैं, समझदार हैं. हम कानून अपने हाथ नहीं लेंगे.

कहते हैं समझदार की मौत है.





3 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

दैट बास्टर्ड।

राज भाटिय़ा said...

भाई आप ने सही लिखा, लेकिन अगर सुयर के पास जाओ तो वो हरमी जो पीछे से निकलाता है वोही मुंह से खा लेता है, उसे अपनी पूंछ से इधर उधर भी फ़ेलाता है, इस लिये सुअर से दुरी भली...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

इस बुड्ढे की दाढी में तिनका नहीं पूरी झाडू ही है - शुक्र है अपने हिसाब के मुल्क रसीद हुआ।