Wednesday, August 20, 2008

छोट्टी बहन !


"आप अपनी सेहत का ध्यान रखा करें। " मेरे मामा ने मेरी मां को आग्रह किया। उस दिन मैंने ध्यान दिया कि वो अपने से छोट्टी बहन को 'आप' कह संबोधित करतें थे। पहले ऐसा नहीं था । पहले वो उन कि छोट्टी बहन ही हुआ करती थीं। मेरी कल्पना में वो भी बचपन में साथ साथ खाते पीते, हँसते खेलते, लड़ते झगड़ते रहे होंगे। छोट्टी बहन की छोट्टी बड़ी जिद्दों को बड़े भाई ने लाड दुलार से पूरा किया होगा। क्या तब भी उन्होंने उसे 'आप' कह पुकारा होगा, मेरे मन ने शुन्य में प्रश्न किया और स्वयं ही उत्तर दिया, 'कभी नहीं'। फिर ये परिवर्तन कब आया होगा ? परन्तु मेरी व्यवहारिक बुद्धि इस का उत्तर जानती थी।


मेरे मामा का वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था। पत्नी का परिवार पर अनुचित नियंत्रण था तथा पति हाशिये पर धकेल दिया गया। संतान ने भी पिता का साथ कभी न दिया। दुर्दैव ने परिवार की सारी सुख-समृधि निगल ली। संतानों की शिक्षा, उन की शादियाँ , कारोबार कुछ भी संतोषजनक नहीं था। और फिर एक दिन परिवार ने मेरे मामा को एक प्रकार से अलग कर दिया। अपना बनायो अपना खायो। जीर्ण शीर्ण से हवेलीनुमा पुश्तैनी मकान की निचली मंजिल की अँधेरी कोठरी में वो अपने जीवन के अन्तिम चरण के दिन गुजारने लगे। रिश्तेदारों अपनी सामर्थ्येनुसार सहायता की परन्तु "यहाँ सब के सर पे सलीब है' के नियम के अंतर्गत कौन कितने दिन सहायता कर सकता है। तो कभी कोई तो कभी कोई, उन के दिन, सप्ताह या महीने का प्रबंध कर देता। कभी शहर में सब से अधिक फैशन करने वाला आज रिश्तेदारों या मित्रों के दिए कपडों से गुजरा करता । महीने दो महीने में वो अपनी छोट्टी बहन के पास सहायता के लिए आ जाते और वो अपनी योग्यता अनुसार उन की सहायता कर देती।


और इस अनुकम्पा ने कब 'छोट्टी' को 'आप' बना दिया, शायद किसी को पता ही नहीं चला।



Sunday, July 6, 2008

अमर चित्र कथा


अफजल खान के कटे हुए सर को अपने भाले पर टांग गर्व से विजय प्रदर्शन करते अपने मराठा सैनिकों को देख वीर शिवाजी ने तुंरत उन्हें टोकते हुए कहा, "अपने मृत शत्रु का अपमान करना हमें शोभा नहीं देता। अफजल खान का ससम्मान अन्तिम संस्कार होना चाहिए।" अमर चित्र कथा के शिवाजी अंक के यह शब्द मुझे सचित्र ध्यान हैं। केवल यही नहीं अपितु और भी बहुत से अंक मेरे मन मष्तिष्क पर उन के रंगीन चित्रों सहित गुदे हुये हैं।




राज जी की पोस्ट, चिंतन को पढ़ अमर चित्र कथा मेरी आंखों के आगे घूम गयी। बाल्यकाल में (माशाल्लाह मैं तो अभी भी बालक सा ही अनुभव करता हूँ) मैंने अनगिनत अंक पढ़े होंगे और कई अंक अनगिनत बार पढ़े होंगे। कई कई घंटे मैं उन पुस्तकों से चिपका रहता था। भारतीय इतिहास माला का शायद ही कोई नायक होगा जिस का अंक मैंने नहीं पढ़ा होगा। केवल पढ़ा ही नहीं मेरा बाल मन उन चित्रों को देख उसी प्रवाह में बह जाता था और मैं भी गोरा-बादल जैसे चित्तोड़गढ़ के किले से रानी पद्मिनी पर बुरी नजर रखने वाले अल्लाउद्दीन खिलजी के शिविर पर टूट पड़ने को आतुर हो जाता। मैं भी अपने आप को महिरावण की कैद से रामजी को छुडाने के लिए मक्खी बने हनुमान के साथ उड़ता पाता। नरेन् का सभी से प्रभु देखे होने का प्रश्न करना तथा स्वामी परमहंस का बिस्तरे नीचे धन के कारण चिंहुक उठाने का चित्र आज भी मेरी आंखों के सामने स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसे कई प्रसंग मेरी स्मृति में स्थाई रूप से अंकित हैं। इन्ही के साथ अमर चित्र कथा की जातक कथाएँ, पंचतंत्र की कहानियाँ, हितोपदेश इत्यादि सम्मिलित हैं। मुझे ध्यान हैं कि मेरे पिता जी ने उस समय मेरे लिए किराये पर पुस्तकें पढने के लिए मासिक शुल्क की व्वयस्था कर रखी थी।





और केवल अमर चित्र कथा ही नहीं, बल्कि नंदन, चंदामामा, बाल-भारती की छोटी व् सरल जीवनियाँ मेरी पठनीय पुस्तकों में थी। ऐसा नहीं है की मैंने चलता फिरता प्रेत बेताल या जादूगर मेंड्रेक या फ्लैश गोर्डोन या जासूस रिप किर्बी या बहादुर या मधु मुस्कान और टिंकल का कोई भी अंक छोड़ दिया हो परन्तु अमर चित्र कथा का स्थान मेरी पढ़ी पुस्तकों में सब से ऊँचा है। भारतीय बाल वर्ग को अमर चित्र कथा एक अनमोल उपहार है और अगर इन पुस्तकों को भारतीय शिक्षा पद्दति में जोड़ दे तो मैकाले विष से ग्रसित, भारतीय संस्कृति को हेय दृष्टि से देखने वाली हमारी युवा पीढी शायद भारतीय वैभव पहचान पायें।







विदाई !

मित्र की विदाई में आयोजित एक समारोह में दुसरे मित्र ने अपने संदेश में कहा, "कुछ शत्रु जब मिलते हैं तो जान ले लेते हैं, और कुछ मित्र जब बिछुड़ते हैं तो प्राण ले लेते हैं।" उन्होंने बहुत भावुक हो मुझे यह बात सुनाई । विदाई कार्यक्रम इन्ही का था और वो भी आज से बीस बरस पहले। "और कारण चाहे जो भी रहा हो लेकिन उस विदाई समारोह एक लगभग एक महीने के बाद वो स्वयं अपनी देह त्याग इस संसार से विदा हो गये। मेरे मन में यह शब्द उन के अन्तिम शब्दों जैसे अंकित हो गए। प्रणय, इन बीस वर्षों में तुम दुसरे व्यक्ति हो जिस से मैंने यह बात की है।" अपने भाव छिपाने के लिए उन्होंने चाय का प्याला मुंह से लगा लिया। और कुछ देर के लिए हम दोनों चुप हो गए।






Wednesday, July 2, 2008

हमारे गुप्ता जी !


गुप्ता जी हमारे पड़ोस में पिछले वाले ब्लाक में रहते हैं। मेरा अपनी उन से कोई नमस्ते, राम राम नहीं है, परन्तु यदा कदा सुबह अपनी गैलरी में चाय पीते समय मैं उन्हें देख लेता हूँ। कोई पचास के पेटे में गुप्ता जी अनोखे जीव है। मेरी रूचि उन में तब जगी जब एक बार मैंने ध्यान दिया कि हर दिन लगभग साढ़े नौ बजे कोई स्कूटर स्टार्ट करता था और तब तक हार्न पर से हाथ नहीं उठता था जब तक सड़क के अन्तिम सिरे से आंखों से औझल न हो जाए। कुछ दिन तो मैंने अधिक ध्यान नहीं दिया परन्तु यह सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था। फिर एक दिन मैं सत्य की खोज के विशेष उद्देश्य से सवा नौ बजे बाहर आ खड़ा हुआ और देखा यह गुप्ता जी थे जो बड़े मनोयोग से अपना स्कूटर साफ़ कर और फिर सर पर शिरश्त्रान धारण कर उसे स्टार्ट करते तथा साथ ही हार्न चालु हो जाता था तब भी कोई दस पन्द्रह सेकंड्स तक वो खड़े उसे निहारते रहते और तत्पश्चात ही स्कूटर स्टैंड से उतार आगे चलते।


पहले मुझे लगा शायद हार्न का बटन ख़राब होगा, लेकिन एक दिन जब वो स्कूटर स्टार्ट कर चलने की तैयारी में थे (और हार्न बज रहा था) तभी उन की पत्नी ने घर से निकल उन से कुछ बात की और मजे की बात है कि उतने समय हार्न नहीं बजा और बात समाप्त होते ही उस कर्कश हार्न ने अपना राग छेड़ दिया। अगर गुप्ता जी संगीत प्रेमी थे (जो वो दूर दूर से नहीं लगते थे) तो भी यह बेसुरा हार्न कहीं भी हिमेश रेशमिया के सुर से मेल नहीं खाता था। मामला संगीन हो गया था और मैं इस मामले की तह तक पहुचने को बेकरार। घर में अन्य सदस्यों से पूछा तो सभी ने अनिभिज्ञता जताई और साथ ही वे लोग भी मेरी तरह उत्सुक हो गए। उस के बाद तो यह हमारा शुगल ही हो गया। हर सुबह जब स्कूटर स्टार्ट होता तो हम हार्न बजने का इन्तजार करते और बजते ही कहते की लो साढ़े नौ बज गए।



रहस्य कई दिनों तक बना रहा परन्तु इस दोरान मैं गुप्ता जी की बहुत सी आदतों का ज्ञाता बन गया। हर रोज सुबह गुप्ता जी नौ बजे के आस पास सूर्यदेव को जल देते थे परन्तु यह काम वो अपने घर के बाहर नहीं बल्कि सामने वाले घर के बाहर खड़े हो कर देते थे (वैसे वो अपना स्कूटर भी अपने घर के आगे से धकेल कर सामने वाले घर के दरवाजे पर स्टैंड लगा स्टार्ट करते हैं) सूर्य को जल वो अधिकाँश लोगो की तरह ग़लत ढंग से अपनी आँखें बंद कर देते थे। (मुझे बचपन में सिखाया गया था कि प्रभात काल के सूर्य को दिए जा रहे गिरते जल में से सूरज को देखना चाहिए , इस से आंखों को लाभ मिलता है ) सफाई कर्मचारी, सब्जी बेचने वाले, रद्दी खरीदने वाले, गाड़ी धोने वाला, माली, धोबी, किसी दूसरे घर का नौकर, यह सभी लोग गुप्ता जी की हिट लिस्ट में रहते थे। इन किसी से भी अपना कोई छोटा मोटा काम बेगार में करवा लेना गुप्ता जी के बाएं हाथ का काम था। मजे की बात यह है कि मेरे जैसे लोग अपने वैतनिक कर्मचारी से पूरा काम नहीं करवा पाते। गुप्ता जी की अन्य विशेषता यह भी थी कि वो इन सभी लोगों (जो भी जब भी फंस गया) के लिए कोई न कोई काम निकाल ही लेते थे। मैंने ध्यान दिया कि यह सभी शिकार भी गुप्ता जी के घर से निकलने के समय इधर उधर खिसक लेते थे या फिर उन की पुकार को अनसुना करने का प्रयास कर जान बचाते थे। अच्छा, गुप्ता जी भी बहुत दरिया दिल इंसान हैं, वो इन लोगों के उन को अनसुना करने का कभी बुरा नहीं मानते थे और मौका मिलने पर रास्ते में स्कूटर रोक (और हार्न बंद कर) उस गाड़ी धोने वाले को या सफाई वाले को बड़े प्यार से उलाहना देते, "देख ले दोस्त, तू फिर आया नहीं !" और वो भी उतने ही सम्मान से उत्तर देता, "कल जरूर आऊंगा बाबु जी !" पर न तो वो आता न गुप्ता जी बुरा मानते और न ही उसे हर दिन टोकना छोड़ते। बहुत बार मैंने गुप्ता जी को सुबह हाथ में हेलमेट लिए बिना स्कूटर के जाते देखा, माफ़ कीजियेगा, आते भी देखा। यह सिलसिला भी कई दिन चला, सोचा कोई मित्र इन को अपने साथ स्कूटर पर ले कर जाता होगा (हमारे शहर में दोपहिये पर दोनों सवारियों के लिए हेलमेट अनिवार्य है) परन्तु यह अर्ध सत्य ही निकला, चूँकि मैं व्योमकेश बक्षी के भांति गुप्ता जी पर नजर रखे था तो पता चला कि लिफ्ट तो वे लेते थे परन्तु उस सुविधा के लिए दूसरे व्यक्ति का उन का परिचित होना कोई जरुरी नहीं था । वो अपने इस अभियान के तहत समाज में भाईचारा बढ़ा रहे थे। मेरी उन के प्रति श्रद्धा तब और बढ़ गई जब एक बार शाम को घर वापसी के लिए उन्हें घर से मात्र कुछ कदमो की दूरी पर लिफ्ट मांगते देखा। यहाँ भी लिफ्ट न देने वाले के लिए उन के चेहरे पर कोई मलाल नहीं आता था। ऐसे मौकों पर गुप्ता जी को देख मुझे 'सबहिं नचावत राम गोसाईं' के लाला घासी राम की याद आ जाती थी जो घसीट्पुर गाँव का बनिया था तथा बहुत मनोयोग से अपने ग्राहकों को कम तोल कर लूटता था। इस धांधली को वो अपना धर्म मान निष्ठापूर्वक निभाते थे और कभी कभार पकड़े जाने पर ग्राहक से मार खा भी बूरा न मानते थे और अगली बार फिर कम तोलते। खैर, गुप्ता जी के हार्न वाला रहस्य लगता था नेताजी सुभाष चंदर बोस की मृत्यु के रहस्य की भांति रहस्य ही रह जाएगा।



खैर, एक दिन शुभ महूर्त (हर घटना का महूर्त तह है) पर मुझे गुप्ता जी के सामने वाले घर में जाने का मौका मिला (वो ही घर जिस के आगे गुप्ता जी के सारे महत्वपूर्ण कार्य संपन्न होते थे)। सुबह के कोई साढ़े नौ बजे होंगे और हमारे बात करते करते युद्ध के बिगुल जैसे गुप्ता जी के चेतक की हुंकार सुनाई देने लगी । मेरे चेहरे पर तत्काल हुए परिवर्तन को उस घर के स्वामी ने देख लिए और कारण पुछा, जिस के उत्तर में मैंने यह हार्न बजने की वजह उन से पूछी। मेरे इस प्रश्न पर दोनों पति पत्नी हंसने लगे।



उन दोनों ने जो बताया वो इस प्रकार था: गुप्ता जी के घर के ऊपर वाली मंजिल में एक सेवानिवृत दत्त साहिब रहते थे। एक बार सच ही गुप्ता जी के स्कूटर का हार्न का बटन ख़राब हो गया था जिस से हार्न लगातार बजता रहता था और गुप्ता जी उसे ठीक नहीं करवाते थे। एक दिन दत्त साहिब ने सहज भावः से गुप्ता जी को उसे ठीक करवाने की सलाह दे दी। गुप्ता जी दत्त साहिब की गाड़ी अपने घर के आगे खड़े होने से पहले ही खफा रहते थे तो यह उन को अपनी भड़ास निकलने का अच्छा मौका मिल गया। फिर क्या था, बटन ठीक हो जाने के बाद भी गुप्ता जी स्कूटर स्टार्ट कर हार्न बजाना शुरू कर देते फिर कुछ समय तक वहां ठहर दत्त साहिब को तपाने के लिए हार्न बजाते रहते और तब तक बजाते रहते जब तक सड़क के अन्तिम छोर तक न पहुँच जाते। दत्त साहिब इस से तपते हो न हो लेकिन गुप्ता जी की आत्मा इस से बहुत तृप्त होती थी और वो दोगुने उत्साह से अपना अगला शिकार ढूंढने निकल पड़ते।



चलिए, मुझे अपनी शंका का समाधान मिल गया है और लगता है गुप्ता जी को कोई नया शिकार मिल गया है क्योंकि अचानक ही उन का हार्न बजना बंद हो गया है।




Sunday, June 29, 2008

सत्यजीत रे !

सत्यजीत रे की कोई फ़िल्म तो अभी तक नहीं देख पाया हूँ, परन्तु इस बार उन की लिखी कहानियाँ पढने को मिलीं। मूलत: बांग्ला में लिखी यह लघु कहानियाँ प्रभात गुप्त द्वारा हिन्दी में अनुवादित हैं। कुल सात कहानीयों की कोई दो सौ पृष्ठों की पुस्तक मैंने दो बैठकों में पूरी कर ली थी।


जीवन के अन्तिम पढाव पर आस्कर की घोषणा के बाद ही भारतीय मीडिया की नजरों में आए रे , फ़िल्म निर्माता होने के साथ साथ एक उत्कृष्ट चित्रकार और लेखक भी थे शायद ही अधिक लोग जानते होंगे। खैर, इस कहानी संग्रह की बात करें तो सभी कहानियाँ रोचक तथा एक विशेष आकर्षण से भरीं थी। आलौकिक शक्ति, मनोविज्ञान, सत्यान्वेषी बुद्धि, रहस्य तथा रोमांच से गुथी विभिन्न कथाएँ पाठक को पुस्तक रखने नहीं देतीं। बातिक बाबु, हंसने वाला कुत्ता और जासूस फेलुदा की सोने का किला तो निश्चित रूप से सुंदर रचनाएँ हैं।


सत्यजित रे द्वारा निर्देशित / निर्मित कुछ फिल्में पहले से ही मेरी सूचि पर थी परन्तु इस कहानी संग्रह ने मेरी उस उत्कंठा को उबार ही नहीं दिया बल्कि उस सूचि में उन के द्वारा रचित और रचनायों को भी जोड़ दिया है।


Wednesday, June 18, 2008

पुण्य स्मरण:


कार्यक्रम एक छात्रावास का था जिस में अधिकाँश बच्चे उत्तर व् उत्तर पूर्व भारत के जनजातिय क्षेत्रों के अभावग्रस्त परिवारों के थे। कार्यक्रम बहुत सादा और सजीव रहा । लगभग सभी बच्चों ने (हिन्दीभाषी न होते हुए भी) बहुत सुंदर प्रस्तुतिकरण किया। बाद में छात्रावास के प्रबंधक द्वारा दिए गए वृत्त से पता लगा कि वहां रहने वाले बच्चों में सब से कम आयु का बालक पॉँच - छ वर्ष का था। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद बच्चों के साथ भोजन कर हम लोग अपनी कार से लौट रहे थे। अपने एक मित्र के साथ वे पिछली सीट पर बैठे बातचीत कर रहे थे और मैं मूक श्रोता बन गाड़ी चला रहा था।



अनायास ही उन के मित्र ने पूछा कि वे कुछ उदास लग रहें हैं क्या बात है ? चौंक कर मैंने भी रियर व्यू मिरर में उन का 'उदास' चेहरा देखने का प्रयास किया। सामने से आने वाली गाड़ियों के प्रकाश में सच ही वे कुछ भावुक से लग रहे थे। "मेरे ऊपर कुछ समय इस छात्रावास के संरक्षक की जिम्मेवारी रही है" उन्होंने शुन्य में निहारते कहना शुरू किया। "उस समय इस छात्रावास के बच्चों के वार्डन के रूप में एक परिपक्व दम्पति नियुक्त था । इस बीच मेरी व्यस्तता बढने के कारण काफ़ी समय मेरा यहाँ आना नहीं हुआ। आज इतने दिनों के बाद आने पर पता चला कि प्रबंध समिति ने उस दम्पति के स्थान पर एक तरुण युवक को नियुक्त कर दिया है।" वे निश्चित ही उदास स्वर में बोले थे।



मैं अभी भी उन की चिंता का कारण न समझ हैरान हो रहा था और एक पल साँस ले वे फिर बोले, " महिलाएं संवेदनशील होतीं हैं और बच्चे भी पुरूष की अपेक्षा किसी महिला से अधिक स्नेह रखतें हैं । वो दोनों पति पत्नी बड़े मनोयोग से बच्चों की संभाल करते थे। बच्चे भी उस महिला को अपनी माँ समझ दुःख सुख कह लेते होंगे। परन्तु यह अविवाहित नया वार्डन कैसे बच्चों की देखभाल कर पायेगा ? रात्रि में सोने के समय बत्तियां बुझा अपने कमरे में सो जाता होगा । उस को कल्पना भी नहीं होगी कि किसी बच्चे को उस की जरुरत होगी। पॉँच साल का वो नन्हा बालक जब रात को अपनी मां को याद कर रोता होगा तो कौन उसे सीने से लगा चुप कराता होगा ? " इस के आगे वे कुछ नहीं बोले न ही हम में से कोई कुछ कह पाया। हवा एकदम नमी से भर गयी लगती थी।




यह बात कोई चार साल पुरानी है। मैं जो अपने पापा को बहुत सख्त समझता था, उस दिन उन की उदासी देख दंग रह गया। बाहर से इतने कठोर दिखने वाले अंदर माँ का ह्रदय रखतें थे, सोच कर मन भर आता है। काश आप कुछ और समय हमारे साथ रहते। १८ जून को आप की पुण्यतिथि पर भावभीनी पुष्पान्जिलि ।






Sunday, April 27, 2008

बात पते की !

"अपने जीवन में ही मनुष्य चार योनियों को प्राप्त करता है।" नरेश के पिता जी ने बताया।

लगभग पचहतर वर्ष की आयु वाले नरेश के पिता काफी सजग व सक्रिय लग रहे थे। नरेश के गांव में उस के घर जलपान हेतु हम लोग जब अतिथि कक्ष में बैठे थे तो वो हमारे बीच आ बैठे । अपने दांत विहीन पोपले मुंह से जब उन्होंने बातें सुनानी शुरू की तो हम लोग चाय पीना भूल गए । काशी से पहली बार हिमाचल के किसी गांव में आए हमारे एक मित्र ने जब दुर्गम हिमाचली क्षेत्रों में भी साक्षरता पर विस्मय प्रकट किया तो नरेश के पिता ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा के विषय में अपने दादा की बात बताई जिन्होंने "श्री गणेशाय नमः" से उन की शिक्षा शुरू की। उन के अनुसार उन दिनों 'ग' से 'गणेश' होता था और आजकल 'ग' से 'गधा' । अंग्रेजी वर्णमाला पर व्यंग करते हुए उन ने कहा देखो ये सारी जानवरों से भरी पड़ी है , शुरुआत ही गधे के नाम ( a for ass) से होती है।


"और आप का स्वास्थ्य कैसा रहता है", मैंने पूछा । " अपने स्वास्थ्य का क्या है, मनुष्य अपने जीवन में कुल चार योनिओं से गुजरता है"। उन्होंने मेरे प्रश्न का सीधा उत्तर न देते हुए नयी बात शुरू की। "अपने जीवन के मात्र प्रथम पच्चीस वर्ष ही वो मनुष्य का जीवन जीता है। नरेश तो खैर अठाईस साल का हो गया । परन्तु विवाह से पहले मानव मानव की योनि में रहता है। विवाह की गृहस्थी में जुतने पर उस की योनि बैल की हो जाती है। घर परिवार का बोझ, काम काज की चिंता, बच्चों व पत्नी की आवश्य्कतायों को पूरा करने के लिए उसे हल में जुते बैल जैसे ही श्रम करना पड़ता है। उस के पश्चात् जब बच्चे बड़े हो जातें हैं और अपनी मनमानी करते पिता की नहीं सुनते, पत्नी भी इतने वर्षों में पति की परवाह करना कम कर देती है तो व्यक्ति सारा दिन बस भोंकता ही रहता है। पर उस की सुनता कोई नहीं तब यह तीसरी योनि होती है।" वो केवल कथा ही नहीं सुना रहे थे बल्कि साथ साथ अभिनय भी कर रहे थे। हम लोग हंस हंस कर लोट पोट हो रहे थे।


"और चौथी योनि?" हम में से किसी से उत्सुकता से पूछा , कोई भी इतनी रोचक बात का क्रम टूटने नहीं देना चाहता था । "चौथी योनि में कानों से सुनायी नहीं देता, आंखों से दिखायी नहीं देता, रात को नींद नहीं आती । व्यक्ति गर्दन झुकाए बैठा रहता है, कोई उस के आस पास आना नहीं चाहता। यह उल्लू की योनि होती है।" उन्होंने भी उसी लय में अपनी बात का क्रम जारी रखा। वो उसी प्रकार का अभिनय करते हुए हंस रहे थे। "तो मैं आजकल उल्लू की योनि में हूँ। पहले जब लोग यह बात सुनाया करते थे तो मैं भी उन पर हंसा करता था पर अब अनुभव करता हूँ यह सत्य सिद्ध बात है। कहतें हैं न, बुजुर्गों का कहा और आंवले का खाया बाद में ही पता चलता है" नरेश के पिता जी अपनी बात पूरी की। इसी के साथ ही किसी ने भोजन वितरण आरंभ होने की सूचना दी और हम लोग उठ खड़े हुए ।